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Deepak Jain Deep
tere jalvo ne kaisi shart rakh dii
tere jalvo ne kaisi shart rakh dii | तेरे जल्वों ने कैसी शर्त रख दी
- Deepak Jain Deep
तेरे
जल्वों
ने
कैसी
शर्त
रख
दी
की
ख़ुश्बू
देखने
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
का
बसेरा
और
छतों
पर
तो
क्या
पेड़ों
ने
कोई
शर्त
रख
दी
मिरे
मालिक
ने
आँखें
तो
अता
कीं
मगर
इन
में
नमी
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
की
उड़ानें
छीन
लीं
और
हदों
को
नापने
की
शर्त
रख
दी
सभी
थे
एकता
के
हक़
में
लेकिन
सभी
ने
अपनी
अपनी
शर्त
रख
दी
- Deepak Jain Deep
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फूल
की
आँख
में
शबनम
क्यूँँ
है
सब
हमारी
ही
ख़ता
हो
जैसे
Bashir Badr
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ये
जो
है
फूल
हथेली
पे
इसे
फूल
न
जान
मेरा
दिल
जिस्म
से
बाहर
भी
तो
हो
सकता
है
Abbas Tabish
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चूमा
था
एक
दिन
किसी
गुल
की
जबीन
को
लहजे
से
आज
तक
मेरे
ख़ुश्बू
नहीं
गई
Afzal Ali Afzal
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तुम
सेे
जो
मिला
हूँ
तो
मेरा
हाल
है
बदला
पतझड़
में
भी
जैसे
के
कोई
फूल
खिला
हो
Haider Khan
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मैंने
चाहा
भी
कि
फिर
इस
संग-दिल
पे
फूल
उगे
पर
तुम्हारी
रुख़्सती
के
बाद
ये
होता
नहीं
Siddharth Saaz
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फूल
से
लेकर
ये
धनिया
लाने
तक
के
इस
सफ़र
को
मुझको
तेरे
साथ
ही
तय
करने
की
ख़्वाहिश
है
पगली
Harsh saxena
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कैसी
बिपता
पाल
रखी
है
क़ुर्बत
की
और
दूरी
की
ख़ुशबू
मार
रही
है
मुझ
को
अपनी
ही
कस्तूरी
की
Naeem Sarmad
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बिखर
के
फूल
फ़ज़ाओं
में
बास
छोड़
गया
तमाम
रंग
यहीं
आस-पास
छोड़
गया
Aanis Moin
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फूल
कर
ले
निबाह
काँटों
से
आदमी
ही
न
आदमी
से
मिले
Khumar Barabankvi
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मुनफ़रिद
ख़ुशबू
है
इस
शजर
की
ऐसा
लगता
है
उसने
छुआ
हो
Shadab khan
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अधूरा
ही
रहे
हर
रास्ता
तो
ना
पहुँचे
मंज़िलों
तक
सिलसिला
तो
जिसे
चाहें
वही
खो
जाए
हम
से
हमारे
साथ
फिर
ऐसा
हुआ
तो
जहाँ
आवारगी
बिखरी
पड़ी
हो
मैं
उस
रस्ते
से
मंज़िल
पा
गया
तो
तुझे
पाने
में
ख़ुद
को
भूल
बैठा
तुझे
पा
कर
भी
मैं
तन्हा
रहा
तो
यक़ीं
कर
के
तिरे
पीछे
चले
हैं
नज़र
आए
ना
फिर
भी
रास्ता
तो
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Deepak Jain Deep
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खोने
का
मलाल
रह
गया
आइने
में
बाल
रह
गया
तेरे
बा'द
अपना
मश्ग़ला
ग़म
की
देख-भाल
रह
गया
तेरे
इस
हुनर
के
सामने
मेरा
सब
कमाल
रह
गया
पहले
तेरे
रंग
थे
वहाँ
मकड़ियों
का
जाल
रह
गया
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Deepak Jain Deep
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अपने
आप
को
यूँँ
समझाते
रहते
हैं
उम्मीदों
के
पर
सहलाते
रहते
है
अपने
घर
में
घर
जैसी
इक
बात
तो
है
दुख-सुख
दोनो
आते
जाते
रहते
हैं
तस्वीरों
का
शौक़
कहाँ
तक
ले
आया
परछाईं
पे
अक्स
बनाते
रहते
हैं
अपना
ज़ब्त
ना
टूटे
इस
के
ख़ातिर
हम
दीवारों
को
दर्द
सुनाते
रहते
हैं
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Deepak Jain Deep
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ऐसे
दरकिनार
हो
गए
हाशिए
के
पार
हो
गए
क्या
थी
वो
जुदाई
की
ख़बर
लफ़्ज़
तार
तार
हो
गए
बरसों
बा'द
ये
पता
चला
हम
कहीं
शिकार
हो
गए
तेरे
बा'द
क्या
बताएँ
हम
कैसे
बे-हिसार
हो
गए
इक
तिरी
सदा
ने
क्या
छुआ
दर्द
बे-क़तार
हो
गए
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Deepak Jain Deep
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ये
उस
की
नींद
को
क्या
हो
गया
है
मिरी
आँखों
में
शब
भर
जागता
है
यहाँ
कैसे
रहें
महफ़ूज़
चेहरे
यहाँ
टूटा
हुआ
हर
आइना
है
यक़ीं
इस
बात
का
अब
तक
नहीं
है
कि
मेरी
प्यास
से
दरिया
बड़ा
है
दिमाग़-ओ-दिल
हैं
पहरे-दार
जैसे
जो
इक
सोए
तो
दूजा
जागता
है
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Deepak Jain Deep
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