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Deepak Jain Deep
apne aap ko yuñ samjhaate rahte hain
apne aap ko yuñ samjhaate rahte hain | अपने आप को यूँँ समझाते रहते हैं
- Deepak Jain Deep
अपने
आप
को
यूँँ
समझाते
रहते
हैं
उम्मीदों
के
पर
सहलाते
रहते
है
अपने
घर
में
घर
जैसी
इक
बात
तो
है
दुख-सुख
दोनो
आते
जाते
रहते
हैं
तस्वीरों
का
शौक़
कहाँ
तक
ले
आया
परछाईं
पे
अक्स
बनाते
रहते
हैं
अपना
ज़ब्त
ना
टूटे
इस
के
ख़ातिर
हम
दीवारों
को
दर्द
सुनाते
रहते
हैं
- Deepak Jain Deep
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वो
तिरे
नसीब
की
बारिशें
किसी
और
छत
पे
बरस
गईं
दिल-ए-बे-ख़बर
मिरी
बात
सुन
उसे
भूल
जा
उसे
भूल
जा
Amjad Islam Amjad
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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मिले
तो
कुछ
बात
भी
करोगे
कि
बस
उसे
देखते
रहोगे
Shariq Kaifi
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तुम्हें
ये
किसने
कहा
रब
को
नहीं
मानता
मैं
ये
और
बात
कि
मज़हब
को
नहीं
मानता
मैं
Bhaskar Shukla
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न
उसने
हाथ
लगाया
न
उसने
बातें
कीं
पड़े
पड़े
यूँँ
ही
ख़ुद
में
ख़राब
हो
गए
हम
Abhishek shukla
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दिल
लगाने
से
ये
दिल
डरता
नहीं
है
मेरा
दिल
इस
बात
से
डरता
बहुत
है
Akshay Sopori
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कू-ब-कू
फैल
गई
बात
शनासाई
की
उस
ने
ख़ुश्बू
की
तरह
मेरी
पज़ीराई
की
Parveen Shakir
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जहान
भर
में
न
हो
मुयस्सर
जो
कोई
शाना,
हमें
बताना
नहीं
मिले
गर
कोई
ठिकाना
तो
लौट
आना,
हमें
बताना
कुछ
ऐसी
बातें
जो
अनकही
हों,
मगर
वो
अंदर
से
खा
रही
हों
लगे
किसी
को
बताना
है
पर
नहीं
बताना,
हमें
बताना
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Vikram Gaur Vairagi
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है
कुछ
ऐसी
ही
बात
जो
चुप
हूँ
वर्ना
क्या
बात
कर
नहीं
आती
Mirza Ghalib
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उसे
किसी
से
मोहब्बत
थी
और
वो
मैं
नहीं
था
ये
बात
मुझ
सेे
ज़ियादा
उसे
रुलाती
थी
Ali Zaryoun
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ये
उस
की
नींद
को
क्या
हो
गया
है
मिरी
आँखों
में
शब
भर
जागता
है
यहाँ
कैसे
रहें
महफ़ूज़
चेहरे
यहाँ
टूटा
हुआ
हर
आइना
है
यक़ीं
इस
बात
का
अब
तक
नहीं
है
कि
मेरी
प्यास
से
दरिया
बड़ा
है
दिमाग़-ओ-दिल
हैं
पहरे-दार
जैसे
जो
इक
सोए
तो
दूजा
जागता
है
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Deepak Jain Deep
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लम्हे
तेरी
जुदाई
के
हिस्से
हैं
तन्हाई
के
एक
ही
जैसे
क़िस्से
हैं
शोहरत
और
रुस्वाई
के
धड़कन
धड़कन
बजते
हैं
सातों
सुर
शहनाई
के
तेरे
ज़र्फ़
से
कितने
कम
पैमाने
गहराई
के
तेरी
याद
में
शामिल
ही
कुछ
झोंके
पुर्वाई
के
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Deepak Jain Deep
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शाम
से
ज़िद
पर
अड़े
हैं
ख़्वाब
पलकों
पर
खड़े
हैं
ये
शिकन-आलूद
बिस्तर
नींद
के
टुकड़े
पड़े
हैं
रात
की
काली
रिदा
में
क़ीमती
मोती
जड़े
हैं
रात
भर
पागल
हवा
से
घर
के
दरवाज़े
लड़े
हैं
हो
सके
तो
सर
झुका
ले
वक़्त
के
तेवर
कड़े
हैं
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Deepak Jain Deep
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ऐसे
दरकिनार
हो
गए
हाशिए
के
पार
हो
गए
क्या
थी
वो
जुदाई
की
ख़बर
लफ़्ज़
तार
तार
हो
गए
बरसों
बा'द
ये
पता
चला
हम
कहीं
शिकार
हो
गए
तेरे
बा'द
क्या
बताएँ
हम
कैसे
बे-हिसार
हो
गए
इक
तिरी
सदा
ने
क्या
छुआ
दर्द
बे-क़तार
हो
गए
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Deepak Jain Deep
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खोने
का
मलाल
रह
गया
आइने
में
बाल
रह
गया
तेरे
बा'द
अपना
मश्ग़ला
ग़म
की
देख-भाल
रह
गया
तेरे
इस
हुनर
के
सामने
मेरा
सब
कमाल
रह
गया
पहले
तेरे
रंग
थे
वहाँ
मकड़ियों
का
जाल
रह
गया
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Deepak Jain Deep
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