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Deepak Jain Deep
lamhe teri judaai ke
lamhe teri judaai ke | लम्हे तेरी जुदाई के
- Deepak Jain Deep
लम्हे
तेरी
जुदाई
के
हिस्से
हैं
तन्हाई
के
एक
ही
जैसे
क़िस्से
हैं
शोहरत
और
रुस्वाई
के
धड़कन
धड़कन
बजते
हैं
सातों
सुर
शहनाई
के
तेरे
ज़र्फ़
से
कितने
कम
पैमाने
गहराई
के
तेरी
याद
में
शामिल
ही
कुछ
झोंके
पुर्वाई
के
- Deepak Jain Deep
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मैं
तेरे
बाद
कोई
तेरे
जैसा
ढूँढता
हूँ
जो
बे-वफ़ाई
करे
और
बे-वफ़ा
न
लगे
Abbas Tabish
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यूँँ
तो
वो
इत्रदान
था
लेकिन
ये
क्या
हुआ
टूटा
तो
एक
सम्त
भी
ख़ुशबू
नहीं
गई
Afzal Ali Afzal
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हिज्र
में
अब
वो
रात
हुई
है
जिस
में
मुझको
ख़्वाबों
में
रेल
की
पटरी,
चाकू,
रस्सी,
बहती
नदियाँ
दिखती
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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लंबा
हिज्र
गुज़ारा
तब
ये
मिलने
के
पल
चार
मिले
जैसे
एक
बड़े
हफ़्ते
में
छोटा
सा
इतवार
मिले
माना
थोड़ा
मुश्किल
है
पर
रोज़
दु'आ
में
माँगा
है
जो
मुझ
सेे
भी
ज़्यादा
चाहे
तुझको
ऐसा
यार
मिले
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Bhaskar Shukla
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तुम
अपने
बारे
में
कुछ
देर
सोचना
छोड़ो
तो
मैं
बताऊँ
कि
तुम
किस
क़दर
अकेले
हो
Waseem Barelvi
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ईद
का
दिन
तो
है
मगर
'जाफ़र'
मैं
अकेले
तो
हँस
नहीं
सकता
Jaafar Sahni
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अभी
तो
जान
कहता
फिर
रहा
है
तू
तुझे
हम
हिज्र
वाले
साल
पूछेंगे
Parul Singh "Noor"
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एक
अरसे
तक
अकेले
हम
चले
फिर
हमारा
नाम
चलने
लग
गया
Tanoj Dadhich
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ये
कब
कहा
था
मुझे
हमनवा
नहीं
देना
मगर
हाँ
फिर
से
वही
बे-वफ़ा
नहीं
देना
मैं
टूट
जाऊँ
तो
आकर
गले
लगा
लेना
कोई
दलील
कोई
मशवरा
नहीं
देना
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Saurabh Sharma 'sadaf'
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लो
फिर
तिरे
लबों
पे
उसी
बे-वफ़ा
का
ज़िक्र
अहमद-'फ़राज़'
तुझ
से
कहा
ना
बहुत
हुआ
Ahmad Faraz
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तेरे
जल्वों
ने
कैसी
शर्त
रख
दी
की
ख़ुश्बू
देखने
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
का
बसेरा
और
छतों
पर
तो
क्या
पेड़ों
ने
कोई
शर्त
रख
दी
मिरे
मालिक
ने
आँखें
तो
अता
कीं
मगर
इन
में
नमी
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
की
उड़ानें
छीन
लीं
और
हदों
को
नापने
की
शर्त
रख
दी
सभी
थे
एकता
के
हक़
में
लेकिन
सभी
ने
अपनी
अपनी
शर्त
रख
दी
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Deepak Jain Deep
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खोने
का
मलाल
रह
गया
आइने
में
बाल
रह
गया
तेरे
बा'द
अपना
मश्ग़ला
ग़म
की
देख-भाल
रह
गया
तेरे
इस
हुनर
के
सामने
मेरा
सब
कमाल
रह
गया
पहले
तेरे
रंग
थे
वहाँ
मकड़ियों
का
जाल
रह
गया
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Deepak Jain Deep
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शाम
से
ज़िद
पर
अड़े
हैं
ख़्वाब
पलकों
पर
खड़े
हैं
ये
शिकन-आलूद
बिस्तर
नींद
के
टुकड़े
पड़े
हैं
रात
की
काली
रिदा
में
क़ीमती
मोती
जड़े
हैं
रात
भर
पागल
हवा
से
घर
के
दरवाज़े
लड़े
हैं
हो
सके
तो
सर
झुका
ले
वक़्त
के
तेवर
कड़े
हैं
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Deepak Jain Deep
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तेरे
दर
तक
आऊँ
मैं
आईना
हो
जाऊँ
मैं
मंज़िल
अपनी
ढूँडे
वो
और
रस्ता
हो
जाऊँ
मैं
उस
का
कोई
ज़िक्र
ना
हो
और
रुस्वा
हो
जाऊँ
मैं
सब
के
दा'वे
वाजिब
हैं
किस
के
हिस्से
आऊँ
मैं
तन्हाई
को
साथ
लिए
भीड़
नहीं
हो
जाऊँ
मैं
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Deepak Jain Deep
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अधूरा
ही
रहे
हर
रास्ता
तो
ना
पहुँचे
मंज़िलों
तक
सिलसिला
तो
जिसे
चाहें
वही
खो
जाए
हम
से
हमारे
साथ
फिर
ऐसा
हुआ
तो
जहाँ
आवारगी
बिखरी
पड़ी
हो
मैं
उस
रस्ते
से
मंज़िल
पा
गया
तो
तुझे
पाने
में
ख़ुद
को
भूल
बैठा
तुझे
पा
कर
भी
मैं
तन्हा
रहा
तो
यक़ीं
कर
के
तिरे
पीछे
चले
हैं
नज़र
आए
ना
फिर
भी
रास्ता
तो
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Deepak Jain Deep
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