zindagi kitnii hai ajeeb-o-ghareeb | ज़िंदगी कितनी है अजीब-ओ-ग़रीब

  - Daud Ghazi
ज़िंदगीकितनीहैअजीब-ओ-ग़रीब
ज़िंदगीक्याहैइकतमाशाहै
ज़िंदगीरहगुज़ार-ए-बे-मंज़िल
बे-तलबबे-हुसूलजीनाहै
हैंफ़क़तचंदलोगहीमुख़्तार
औरबाक़ीजोहैंवोबंदेहैं
क्याफिरेहैंगलेमेंलटकाए
रंज-ओ-मज़लूमियतकेफंदेहैं
फिरभीजीतेहैंक्याख़बरक्याहो
कुछदवामीनहींनिज़ाम-ए-कोहन
गरचेहैयेमक़ाम-ए-दर्द-ओ-मेहन
क्याख़बरमंज़िल-ए-दिगरक्याहो
आजहरचंदहैंबह-हाल-ए-ज़बूँ
कौनजानेकिकलमगरक्याहो
  - Daud Ghazi
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy