husool-e-manzil-e-jaan ka hunar nahin aaya | हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

  - Bakhsh Layalpuri
हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँकाहुनरनहींआया
वोरौशनीथीकिकुछभीनज़रनहींआया
भटकरहेहैंअभीज़ीस्तकेसराबोंमें
मुसाफ़िरोंकोशुऊर-ए-सफ़रनहींआया
तमामरातसितारा-शनासरोतेरहे
नज़रगँवादीसितारानज़रनहींआया
हज़ारमिन्नतेंकींवास्तेख़ुदाकेदिए
येराह-ए-रास्तपेवोराहबरनहींआया
ज़बान-ए-शेरपेमोहर-ए-सुकूतहैअबतक
जलाल-ए-सौत-ओ-सुख़नरंगपरनहींआया
वोतकरहेहैंअज़लसेफ़राज़-ए-गर्दूंपर
नज़रकिसीकोभीनज्म-ए-सहरनहींआया
हमारेशहरकेहरसंग-बारसेयेकहो
हमारीशाख़-ए-शजरपरसमरनहींआया
हरएकमोड़पेहमनेबहुतसदाएँदीं
सफ़रतमामहुआहम-सफ़रनहींआया
दयार-ए-ग़ैरसेमेरावोसर-फिराबेटा
गयाहैघरसेतोफिरलौटकरनहींआया
  - Bakhsh Layalpuri
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