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anupam shah
haseen kuchh khwaab aankhoñ ko kabhi saste nahin milte
haseen kuchh khwaab aankhoñ ko kabhi saste nahin milte | हसीं कुछ ख़्वाब आँखों को कभी सस्ते नहीं मिलते
- anupam shah
हसीं
कुछ
ख़्वाब
आँखों
को
कभी
सस्ते
नहीं
मिलते
कभी
मंज़िल
नहीं
मिलती
कभी
रस्ते
नहीं
मिलते
- anupam shah
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मुझे
एक
लाश
कहकर
न
बहाओ
पानियों
में
मेरा
हाथ
छू
के
देखो
मेरी
नब्ज़
चल
रही
है
Azm Shakri
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सफ़र
हालाँकि
तेरे
साथ
अच्छा
चल
रहा
है
बराबर
से
मगर
एक
और
रास्ता
चल
रहा
है
Shariq Kaifi
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जब
भी
कोई
मंज़िल
हासिल
करता
हूँ
याद
बहुत
आती
हैं
तेरी
ता'रीफ़ें
Tanoj Dadhich
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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इश्क़
अगर
बढ़ता
है
तो
फिर
झगड़े
भी
तो
बढ़ते
हैं
आमदनी
जब
बढ़ती
है
तो
ख़र्चे
भी
तो
बढ़ते
हैं
माना
मंज़िल
नहीं
मिली
है
हमको
लेकिन
रोज़ाना
एक
क़दम
उसकी
जानिब
हम
आगे
भी
तो
बढ़ते
हैं
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Tanoj Dadhich
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बहुत
क़रीब
रही
है
ये
ज़िन्दगी
हम
से
बहुत
अज़ीज़
सही
ए'तिबार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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सुखाई
जा
रही
है
जुल्फ़
धोकर
घटा
या'नी
निचोड़ी
जा
रही
है
Satya Prakash Soni
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वो
राही
हूँ
पलभर
के
लिए,
जो
ज़ुल्फ़
के
साए
में
ठहरा,
अब
ले
के
चल
दूर
कहीं,
ऐ
इश्क़
मेरे
बेदाग
मुझे
।
Raja Mehdi Ali Khan
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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लो
ख़ुद
मुख़्तार
होकर
देखते
हैं
कि
अपने
यार
होकर
देखते
हैं
बचे
बर्बाद
होने
से
हैं
अब
तक
चलो
इस
बार
होकर
देखते
हैं
यहाँ
से
मसअला
ये
हल
न
होगा
इसे
उस
पार
होकर
देखते
हैं
कोई
ख़तरा
नहीं
है
दुश्मनी
में
किसी
का
प्यार
होकर
देखते
हैं
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anupam shah
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बचाता
कब
तलक
मैं
एक
रिश्ता
तुम्हें
पाता
तो
घर
कैसे
बचाता
anupam shah
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मैं
कहाँ
का
था
कहाँ
का
कर
गए
कितना
तुम
मेरा
मुनाफ़ा
कर
गए
ग़म
मिटाने
आए
थे
तुम
तो
मिरे
तुम
मिरे
ग़म
में
इज़ाफ़ा
कर
गए
पूछते
थे
साथ
दोगे
उम्र
भर
जो
मुझे
अब
बेसहारा
कर
गए
जो
दु'आ
थी
बद्दुआ
जैसी
लगी
आप
कैसा
इस्तिख़ारा
कर
गए
सामने
दरिया
था
और
प्यासा
था
मैं
और
वो
मुझ
सेे
किनारा
कर
गए
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anupam shah
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तुम्हें
सोचकर
के
मैं
यूँँ
खिल
रहा
हूँ
कि
करवट
बदल
कर
तुम्हें
मिल
रहा
हूँ
वो
जिस
पर
से
लौटे
हैं
सारे
मुसाफ़िर
मैं
ऐसे
ही
दरिया
का
साहिल
रहा
हूँ
बहुत
वक़्त
बीता
समझने
में
ये
भी
मैं
आसाँ
रहा
हूँ
या
मुश्किल
रहा
हूँ
मुझे
छोड़ने
का
गुमाँ
यूँँ
न
करना
न
जाने
मैं
कितनों
की
मंज़िल
रहा
हूँ
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anupam shah
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दिखाया
हौसला
इस
बार
कर
के
मोहब्बत
को
सरेबाज़ार
कर
के
हमारे
यार
छूटे
फिर
गए
तुम
अकेले
हो
गए
हैं
प्यार
कर
के
वो
ग़ुस्सा
कर
के
जाता
था
हमेशा
गया
है
इस
दफ़ा
वो
प्यार
कर
के
ख़रीदी
और
बेची
भावनाएं
इन्ही
रिश्तों
को
क्यूँँं
बाज़ार
करके
ये
इकतरफा
मोहब्बत
अब
न
होगी
अरे
हम
थक
गए
बेगार
कर
के
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anupam shah
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