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anupam shah
main kahaan ka tha kahaan ka kar ga.e
main kahaan ka tha kahaan ka kar ga.e | मैं कहाँ का था कहाँ का कर गए
- anupam shah
मैं
कहाँ
का
था
कहाँ
का
कर
गए
कितना
तुम
मेरा
मुनाफ़ा
कर
गए
ग़म
मिटाने
आए
थे
तुम
तो
मिरे
तुम
मिरे
ग़म
में
इज़ाफ़ा
कर
गए
पूछते
थे
साथ
दोगे
उम्र
भर
जो
मुझे
अब
बेसहारा
कर
गए
जो
दु'आ
थी
बद्दुआ
जैसी
लगी
आप
कैसा
इस्तिख़ारा
कर
गए
सामने
दरिया
था
और
प्यासा
था
मैं
और
वो
मुझ
सेे
किनारा
कर
गए
- anupam shah
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ख़ूब-सूरत
ये
मोहब्बत
में
सज़ा
दी
उसने
फिर
गले
मिलके
मेरी
उम्र
बढ़ा
दी
उसने
Manzar Bhopali
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क्यूँ
डरें
ज़िन्दगी
में
क्या
होगा
कुछ
न
होगा
तो
तजरबा
होगा
Javed Akhtar
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उम्र
कम
पड़
जायेगी
हर
ख़्वाब
गर
पूरा
हुआ
और
गर
पूरा
न
हो
तो
काटती
है
ज़िंदगी
Ajeetendra Aazi Tamaam
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उम्र
भर
साँप
से
शर्मिंदा
रहे
ये
सुन
कर
जब
से
इंसान
को
काटा
है
तो
फन
दुखता
है
Munawwar Rana
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जो
नासमझ
हैं
उठाते
हैं
ज़िन्दगी
के
मज़े
समझने
वाले
तो
बस
उम्र
भर
समझते
हैं
Amit Bajaj
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उसकी
टीस
नहीं
जाती
है
सारी
उम्र
पहला
धोखा
पहला
धोखा
होता
है
Shariq Kaifi
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हम
जिसे
देखते
रहते
थे
उम्र
भर
काश
वो
इक
नज़र
देखता
हम
को
भी
Mohsin Ahmad Khan
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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मैंने
चाहा
तेरे
जाने
में
न
कुछ
कमी
रहे
कोन
चाहे
उम्र
भर
ही
आँखों
में
नमी
रहे
Yogamber Agri
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तर्जुबा
था
सो
दु'आ
की
के
नुकसान
ना
हो
इश्क़
मजदूर
को
मजदूरी
के
दौरान
ना
हो
मैं
उसे
देख
ना
पाता
था
परेशानी
में
सो
दु'आ
करता
था
मर
जाए
परेशान
ना
हो
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Afkar Alvi
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लड़खड़ाते
लफ़्ज़
हैं
और
चाल
बेपरवाह
है
बेख़ुदी
ये
किस
तरह
की
किस
तरह
की
चाह
है
धूप
बारिश
और
गर्मी
तीनों
हमपे
आ
पड़े
इतना
मुश्किल
हो
चला
है
कौन
सा
ये
माह
है
बल
नहीं
तेरी
कमर
के
कोई
तीखे
मोड़
हैं
जो
भी
'आशिक़
रस्ता
भटका
अब
तलक
गुमराह
है
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anupam shah
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कुछ
दीवारों
पर
दरवाज़े
होते
हैं
कुछ
दरवाज़े
दीवारों
से
होते
हैं
anupam shah
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हद
से
अपनी
ये
ज़रा
और
बड़ी
होने
में
टूट
जाती
है
इमारत
ये
खड़ी
होने
में
मुझ
सेे
इक
रोज़
मिलेगा
ये
कहा
है
उसने
अब
तो
सदियां
ही
लगेंगी
वो
घड़ी
होने
में
मसअला
ये
कि
मोहब्बत
को
छुपायें
कैसे
बात
लगती
ही
नहीं
बात
बड़ी
होने
में
टूटता
यूँँ
ही
नहीं
है
यहाँ
कोई
रिश्ता
वक़्त
लगता
है
ये
दीवार
खड़ी
होने
में
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anupam shah
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अभी
सिक्का
हवा
में
है
तो
फ़ैसला
कर
लो
ज़मीं
पे
गिर
गया
अगर
तो
फ़ैसला
कैसा
anupam shah
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अभी
हम
सेे
रूठे
अभी
वो
ख़फ़ा
है
ज़बाँ
से
वो
अपनी
नहीं
बे-वफ़ा
है
हमारे
तो
जीने
का
ये
फ़लसफ़ा
है
न
कोई
ख़सारा
न
कोई
नफ़ा
है
तुम्हीं
याद
आना
न
आना
तुम्हारा
मोहब्बत
है
या
फिर
ये
कोई
जफ़ा
है
फ़ना
हो
चुके
हैं
मुहब्बत
में
हम
तो
ये
लाशों
का
सौदा
ही
अबकी
दफ़ा
है
बुरा
हो
भला
हो
तुम्हें
सोचते
हैं
कि
इस
सेे
बड़ी
भी
कहीं
कुछ
वफ़ा
है
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anupam shah
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