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anupam shah
had se apni ye zara aur badi hone men
had se apni ye zara aur badi hone men | हद से अपनी ये ज़रा और बड़ी होने में
- anupam shah
हद
से
अपनी
ये
ज़रा
और
बड़ी
होने
में
टूट
जाती
है
इमारत
ये
खड़ी
होने
में
मुझ
सेे
इक
रोज़
मिलेगा
ये
कहा
है
उसने
अब
तो
सदियां
ही
लगेंगी
वो
घड़ी
होने
में
मसअला
ये
कि
मोहब्बत
को
छुपायें
कैसे
बात
लगती
ही
नहीं
बात
बड़ी
होने
में
टूटता
यूँँ
ही
नहीं
है
यहाँ
कोई
रिश्ता
वक़्त
लगता
है
ये
दीवार
खड़ी
होने
में
- anupam shah
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लिख
दिया
था
जिल्द
पर
ईसा
का
नाम
साँस
लेने
लग
गए
औराक़
सब
Kiran K
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काँटों
से
दिल
लगाओ
जो
ता-उम्र
साथ
दें
फूलों
का
क्या
जो
साँस
की
गर्मी
न
सह
सकें
Akhtar Shirani
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इतना
मसरूफ़
हूँ
जीने
की
हवस
में
'शाहिद'
साँस
लेने
की
भी
फ़ुर्सत
नहीं
होती
मुझ
को
Shahid Zaki
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कितनी
मुश्किल
के
बाद
टूटा
है
एक
रिश्ता
कभी
जो
था
ही
नहीं
Shahbaz Rizvi
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भले
ही
जान-लेवा
हो
सियासत
को
ग़लत
कहना
मगर
फिर
भी
ये
सच
ईमान
वाले
लोग
कहते
हैं
Amaan Pathan
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प्यार
का
रिश्ता
ऐसा
रिश्ता
शबनम
भी
चिंगारी
भी
यानी
उन
सेे
रोज़
ही
झगड़ा
और
उन्हीं
से
यारी
भी
Ateeq Allahabadi
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आईने
आँख
में
चुभते
थे
बिस्तर
से
बदन
कतराता
था
एक
याद
बसर
करती
थी
मुझे
मैं
साँस
नहीं
ले
पाता
था
Tehzeeb Hafi
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इस
दौर-ए-सियासत
का
इतना
सा
फ़साना
है
बस्ती
भी
जलानी
है
मातम
भी
मनाना
है
Unknown
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हर
क़दम
हर
साँस
गिरवी
ज़िंदगी
रहम-ओ-करम
इतने
एहसानों
पे
जीने
से
तो
मर
जाना
सही
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मैं
अपने
बाप
के
सीने
से
फूल
चुनता
हूँ
सो
जब
भी
साँस
थमी
बाग़
में
टहल
आया
Hammad Niyazi
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जहाँ
तक
न
नज़र
जाए,
ये
मैं
तू
ये
न
रह
जाए
मुकम्मल
इश्क़
करना
तुम,
जहाँ
ये
दिल
न
घबराए
anupam shah
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बहुत
छोटा
सा
कुम्बा
था
बहुत
छोटा
फ़साना
था
ये
क़ौमों
के
दलालों
ने
मेरा
घर
फूँक
रक्खा
है
anupam shah
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इन
रास्तों
पे
अब
मैं
बेबस
सा
हो
खड़ा
हूँ
लगता
है
जैसे
मुश्किल
से
वक़्त
में
पड़ा
हूँ
मैं
घर
को
बंद
कर
के
अक्सर
ये
सोचता
हूँ
जाना
कहाँ
था
मुझको
किस
ओर
चल
पड़ा
हूँ
वो
दूर
का
मुसाफ़िर
जाना
है
दूर
उसको
नाहक़
ही
रास्तों
को
मैं
रोक
के
खड़ा
हूँ
औरों
के
वासते
तो
छोड़ा
बहुत
है
रस्ता
बस
बात
अब
है
अपनी
तो
ज़िद
पे
मैं
अड़ा
हूँ
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anupam shah
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मैं
अर्से
बाद
इतनी
कश्मकश
में
फिर
से
गुज़रा
हूँ
कि
तेरी
इन्तिज़ारी
है
औ
तन्हा
भी
बहुत
ख़ुश
हूँ
anupam shah
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तुम्हारे
वासते
जो
अब
नहीं
क़ाबिल
रहा
हूँ
मैं
उन्हें
पूछो
ज़रा
जिनके
लिए
मुश्किल
रहा
हूँ
मैं
भटकता
फिर
रहा
हूँ
बाद
तेरे
इस
तरह
से
मैं
कभी
दरया
कभी
कश्ती
कभी
साहिल
रहा
हूँ
मैं
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anupam shah
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