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anupam shah
bahut chhota sa kumbaa tha bahut chhota fasaana tha
bahut chhota sa kumbaa tha bahut chhota fasaana tha | बहुत छोटा सा कुम्बा था बहुत छोटा फ़साना था
- anupam shah
बहुत
छोटा
सा
कुम्बा
था
बहुत
छोटा
फ़साना
था
ये
क़ौमों
के
दलालों
ने
मेरा
घर
फूँक
रक्खा
है
- anupam shah
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हम
इश्क़
के
मारों
का
इतना
ही
फ़साना
है
रोने
को
नहीं
कोई
हँसने
को
ज़माना
है
Jigar Moradabadi
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त'अल्लुक़
जो
भी
रक्खो
सोच
लेना
कि
हम
रिश्ता
निभाना
जानते
हैं
Ambreen Haseeb Ambar
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निभाया
जिस
सेे
भी
रिश्ता
तो
फिर
हद
में
रहे
हैं
हम
किसी
के
मखमली
तकिए
के
ऊपर
सर
नहीं
रक्खा
Nirbhay Nishchhal
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इक
लफ़्ज़-ए-मोहब्बत
का
अदना
ये
फ़साना
है
सिमटे
तो
दिल-ए-आशिक़
फैले
तो
ज़माना
है
Jigar Moradabadi
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आप
अपने
से
हम-सुख़न
रहना
हमनशीं
साँस
फूल
जाती
है
Jaun Elia
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दिल
से
साबित
करो
कि
ज़िंदा
हो
साँस
लेना
कोई
सुबूत
नहीं
Fahmi Badayuni
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भले
ही
जान-लेवा
हो
सियासत
को
ग़लत
कहना
मगर
फिर
भी
ये
सच
ईमान
वाले
लोग
कहते
हैं
Amaan Pathan
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अगर
लगता
है
वो
क़ाबिल
नहीं
है
तो
रिश्ता
तोड़ना
मुश्किल
नहीं
है
रक़ीब
आया
है
मेरे
शे'र
सुनने
तो
अब
ये
जंग
है
महफ़िल
नहीं
है
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Tanoj Dadhich
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प्यार
का
रिश्ता
ऐसा
रिश्ता
शबनम
भी
चिंगारी
भी
यानी
उन
सेे
रोज़
ही
झगड़ा
और
उन्हीं
से
यारी
भी
Ateeq Allahabadi
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मजबूरी
में
रक़ीब
ही
बनना
पड़ा
मुझे
महबूब
रहके
मेरी
जो
इज़्ज़त
नहीं
हुई
Sabahat Urooj
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यार
पैसा
तो
हमने
कमाया
बहुत
और
पानी
के
जैसे
बहाएा
बहुत
एक
वा'दा
किया
साथ
में
साथ
का
एकतरफ़ा
ही
उसको
निभाया
बहुत
मयकशी
ही
तो
थी
उम्र
भर
को
रही
आपने
तो
उसे
भी
छुड़ाया
बहुत
ऐ
ख़ुदा
पास
आकर
के
होना
ज़ुदा
दर्द
होता
है
हमको
ख़ुदाया
बहुत
एक
उम्मीद
पर
जी
गए
ज़िंदगी
एक
उम्मीद
ने
दिल
दुखाया
बहुत
रौशनी
जिनके
होते
हुई
थी
कभी
उन
दियों
ने
हमें
फिर
जलाया
बहुत
रहगुज़र
था
मेरा
राह
में
रह
गया
ऐसे
वैसों
से
तूने
मिलाया
बहुत
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anupam shah
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हम
जो
हर
रोज़
ख़ुशी
को
ही
बुलाते
हैं
घर
सिर्फ़
ग़म
हैं
जो
कभी
लौट
के
आते
हैं
घर
हम
सेे
इक
उम्र
तराशी
न
गई
तन्हाई
और
वो
हैं
कि
करीने
से
सजाते
हैं
घर
ये
जो
मैं
हूँ
न
संभलकर
के
पहुँचता
हूँ
घर
लोग
धुत
हैं
जो
नशे
में
वो
दिखाते
हैं
घर
वो
कोई
है
कि
जिसे
प्यार
सिखाते
हैं
हम
बाद
में
ख़ुद
ही
कहीं
और
बसाते
हैं
घर
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anupam shah
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दु'आ
अपनी
भी
ख़ातिर
इस
तरह
कुछ
माँग
ली
मैंने
ये
चाहा
है
कि
तेरे
चाहने
वाले
सभी
ख़ुश
हो
anupam shah
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हम
ज़रा
बेख़याल
होते
हैं
हम
सेे
जब
भी
सवाल
होते
हैं
झूठ
कहते
हुए
नहीं
डरते
लोग
कितने
कमाल
होते
हैं
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anupam shah
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हज़ारों
बार
मर
मर
कर
यही
इक
फ़लसफ़ा
जाना
कि
जब
तक
ज़िंदगी
है
तब
तलक
जीना
ज़रूरी
है
anupam shah
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