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anupam shah
dua apni bhi khaatir is tarah kuchh maang li maine
dua apni bhi khaatir is tarah kuchh maang li maine | दु'आ अपनी भी ख़ातिर इस तरह कुछ माँग ली मैंने
- anupam shah
दु'आ
अपनी
भी
ख़ातिर
इस
तरह
कुछ
माँग
ली
मैंने
ये
चाहा
है
कि
तेरे
चाहने
वाले
सभी
ख़ुश
हो
- anupam shah
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उठते
नहीं
हैं
अब
तो
दु'आ
के
लिए
भी
हाथ
किस
दर्जा
ना-उमीद
हैं
परवरदिगार
से
Akhtar Shirani
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कटी
उम्र
सारी
वफ़ा
करते
करते
किसी
की
मुहब्बत
अदा
करते
करते
वो
थकता
नहीं
है
ज़फा
करते
करते
मैं
थकती
नहीं
हूँ
दु'आ
करते
करते
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Shadab Asghar
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किस
की
होली
जश्न-ए-नौ-रोज़ी
है
आज
सुर्ख़
मय
से
साक़िया
दस्तार
रंग
Imam Bakhsh Nasikh
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तमाम
हैं
बिमारियाँ
मगर
तुम्हें
हुआ
है
इश्क़
तो
अब
तुम्हें
ज़रूरत-ए-दुआ
ही
है
दवा
नहीं
Hasan Raqim
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दु'आ
में
माँग
लूँ
मैं
उसको
लेकिन
फ़क़त
पाना
मेरा
मक़सद
नहीं
है
Shadab Asghar
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लब
पे
आता
था
जो
दु'आ
बन
कर
दिल
में
रहता
है
अब
ख़ला
बन
कर
कितना
इतरा
रहा
है
अब
वो
फूल
तेरे
बालों
का
मोगरा
बन
कर
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Haider Khan
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दफ्न
ताबूत
में
कर
तिरी
हर
ख़ुशी
जश्न
कैसे
मनाते
है
मय्यत
पे
भी
ख़ास
तारीख़
थी
इम्तिहाँ
की
मगर
आज
बारात
उसकी
बुला
ली
गई
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Shilpi
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लंबा
हिज्र
गुज़ारा
तब
ये
मिलने
के
पल
चार
मिले
जैसे
एक
बड़े
हफ़्ते
में
छोटा
सा
इतवार
मिले
माना
थोड़ा
मुश्किल
है
पर
रोज़
दु'आ
में
माँगा
है
जो
मुझ
सेे
भी
ज़्यादा
चाहे
तुझको
ऐसा
यार
मिले
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Bhaskar Shukla
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उम्र
भर
जिसने
न
माँगा
हो
ख़ुदास
कुछ
भी
उस
ने
बस
तुम
से
मोहब्बत
की
दु'आ
माँगी
है
Shadab Asghar
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कमी
कमी
सी
थी
कुछ
रंग-ओ-बू-ए-गुलशन
में
लब-ए-बहार
से
निकली
हुई
दु'आ
तुम
हो
Ali Sardar Jafri
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कहानी
नई
रोज़
लिखकर
मिटानी
न
आसान
है
ये
मेरी
ज़िंदगानी
ज़रा
सोचकर
इश्क़
करना
यहाँ
तुम
रिवायत
पड़ेगी
ये
तुमको
निभानी
ये
नाज़ुक
ग़ज़ल
और
शराफ़त
के
क़िस्से
किसी
की
हैं
बातें
किसी
की
कहानी
कई
रोज़
के
बाद
उन
सेे
मिले
जब
न
मुँह
से
निकाली
वो
बातें
पुरानी
करो
याद
मौसम
ज़रा
वो
पुराना
वो
भीगे
बदन
पे
पिघलता
सा
पानी
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anupam shah
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परिंदा
फड़फड़ाना
चाहता
है
क़फ़स
को
तोड़
देना
चाहता
है
हदों
ने
कर
दिया
इसको
अपाहिज
हदों
से
पार
जाना
चाहता
है
मनाने
में
जिसे
सदियाँ
लगी
थी
वो
मुझ
सेे
रूठ
जाना
चाहता
है
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anupam shah
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रात
से
रोज़
लड़
रहे
हैं
हम
एक
ही
ज़िद
पे
अड़
रहे
हैं
हम
anupam shah
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जाने
का
जो
ग़म
होता
है
तेज
कभी
मद्धम
होता
है
तुम
सेे
बिछड़कर
जाना
हमने
आँख
का
आँसू
नम
होता
है
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anupam shah
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संग-ए-मरमर
की
मूरत
नहीं
आदमी
इस
क़दर
ख़ूब-सूरत
नहीं
आदमी
चंद
क़िस्सों
की
दरकार
है
बस
इसे
आदमी
की
ज़रूरत
नहीं
आदमी
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anupam shah
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