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anupam shah
parinda farfaraana chahta hai
parinda farfaraana chahta hai | परिंदा फड़फड़ाना चाहता है
- anupam shah
परिंदा
फड़फड़ाना
चाहता
है
क़फ़स
को
तोड़
देना
चाहता
है
हदों
ने
कर
दिया
इसको
अपाहिज
हदों
से
पार
जाना
चाहता
है
मनाने
में
जिसे
सदियाँ
लगी
थी
वो
मुझ
सेे
रूठ
जाना
चाहता
है
- anupam shah
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तमन्ना
है
दिवाली
में
दिया
इक
जल
उठे
ऐसा
जला
दे
फ़ासले
सारे
हमारे
दरमियाँ
जो
हैं
Bhoomi Srivastava
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बिठा
दिया
है
सिपाही
के
दिल
में
डर
उसने
तलाशी
दी
है
दुपट्टा
उतार
कर
उसने
मैं
इसलिए
भी
उसे
ख़ुद-कुशी
से
रोकता
हूँ
लिखा
हुआ
है
मेरा
नाम
जिस्म
पर
उसने
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Zia Mazkoor
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दु'आ
करो
कि
सलामत
रहे
मिरी
हिम्मत
ये
इक
चराग़
कई
आँधियों
पे
भारी
है
Waseem Barelvi
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तुझे
किसी
ने
ग़लत
कह
दिया
मेरे
बारे
नहीं
मियाँ
मैं
दिलों
को
दुखाने
वाला
नहीं
Ali Zaryoun
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ये
वो
क़बीला
है
जो
हुस्न
को
ख़ुदा
माने
यहाँ
पे
कौन
तेरी
बात
का
बुरा
माने
इशारा
कर
दिया
है
आपकी
तरफ़
मैंने
ये
बच्चे
पूछ
रहे
थे
कि
बे-वफ़ा
माने
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Kushal Dauneria
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जो
ज़हर
पी
चुका
हूँ
तुम्हीं
ने
मुझे
दिया
अब
तुम
तो
ज़िन्दगी
की
दुआएँ
मुझे
न
दो
Ahmad Faraz
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आज
तो
दिल
के
दर्द
पर
हँस
कर
दर्द
का
दिल
दुखा
दिया
मैं
ने
Zubair Ali Tabish
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बस
मैं
मायूस
होने
वाला
था
और
मौला
ने
तुझ
को
भेज
दिया
Zubair Ali Tabish
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बिछड़
जाएँगे
हम
दोनों
ज़मीं
पर
ये
उस
ने
आसमाँ
पर
लिख
दिया
है
Siraj Faisal Khan
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कहाँ
चराग़
जलाएँ
कहाँ
गुलाब
रखें
छतें
तो
मिलती
हैं
लेकिन
मकाँ
नहीं
मिलता
Nida Fazli
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गुनाहों
का
नहीं
है
इल्म
उसको
क़ैदख़ाने
में
यक़ीनन
छूट
जाएगा
तो
फिर
ये
दिल
लगाएगा
anupam shah
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तुम्हें
सोचकर
के
मैं
यूँँ
खिल
रहा
हूँ
कि
करवट
बदल
कर
तुम्हें
मिल
रहा
हूँ
वो
जिस
पर
से
लौटे
हैं
सारे
मुसाफ़िर
मैं
ऐसे
ही
दरिया
का
साहिल
रहा
हूँ
बहुत
वक़्त
बीता
समझने
में
ये
भी
मैं
आसाँ
रहा
हूँ
या
मुश्किल
रहा
हूँ
मुझे
छोड़ने
का
गुमाँ
यूँँ
न
करना
न
जाने
मैं
कितनों
की
मंज़िल
रहा
हूँ
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anupam shah
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तुम्हें
ख़्वाब
में
देखना
चाहता
हूँ
मैं
नादान
हूँ,
ये
मैं
क्या
चाहता
हूँ
मैं
देखूँ
तुम्हें
और
तुम
मान
जाओ
निगाहों
से
बस
बोलना
चाहता
हूँ
लिखा
तो
था
ख़त
में
निबाहोगे
तुम
भी
तुम्हारे
ख़तों
से
वफ़ा
चाहता
हूँ
ख़ता
है
अगर
इश्क़
करना
यहाँ
तो
मैं
करना
वही
बस
ख़ता
चाहता
हूँ
ये
नफ़रत
निभाना
नहीं
हमको
आता
मोहब्बत
मैं
सौ
मर्तबा
चाहता
हूँ
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anupam shah
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तुम्हें
ही
सोचते
हैं
हर
घड़ी
हर
पल
ख़यालों
में
अरे
तुमने
कहा
था
जाओगे
तुम
छोड़कर
तन्हा
anupam shah
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ख़ुदा!
कैसा
मुक़द्दर
फेंककर
मुँह
पर
मिरे
मारा
बर्फ़
पर
हाथ
रखता
हूँ
तो
जलता
है
बदन
सारा
anupam shah
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