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anupam shah
tumhein sochkar ke main yuñ khil raha hooñ
tumhein sochkar ke main yuñ khil raha hooñ | तुम्हें सोचकर के मैं यूँँ खिल रहा हूँ
- anupam shah
तुम्हें
सोचकर
के
मैं
यूँँ
खिल
रहा
हूँ
कि
करवट
बदल
कर
तुम्हें
मिल
रहा
हूँ
वो
जिस
पर
से
लौटे
हैं
सारे
मुसाफ़िर
मैं
ऐसे
ही
दरिया
का
साहिल
रहा
हूँ
बहुत
वक़्त
बीता
समझने
में
ये
भी
मैं
आसाँ
रहा
हूँ
या
मुश्किल
रहा
हूँ
मुझे
छोड़ने
का
गुमाँ
यूँँ
न
करना
न
जाने
मैं
कितनों
की
मंज़िल
रहा
हूँ
- anupam shah
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बस
टूटी
कश्ती
ही
बतला
सकती
है
इक
दरिया
की
कितनी
शक्लें
होती
हैं
Soubhari Deepesh Sharma
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तिरे
एहसास
में
डूबा
हुआ
मैं
कभी
सहरा
कभी
दरिया
हुआ
मैं
Siraj Faisal Khan
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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ये
नदी
वर्ना
तो
कब
की
पार
थी
मेरे
रस्ते
में
अना
दीवार
थी
आप
को
क्या
इल्म
है
इस
बात
का
ज़िंदगी
मुश्किल
नहीं
दुश्वार
थी
थीं
कमानें
दुश्मनों
के
हाथ
में
और
मेरे
हाथ
में
तलवार
थी
जल
गए
इक
रोज़
सूरज
से
चराग़
रौशनी
को
रौशनी
दरकार
थी
आज
दुनिया
के
लबों
पर
मुहर
है
कल
तलक
हाँ
साहब-ए-गुफ़्तार
थी
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ARahman Ansari
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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हमने
तुझ
पे
छोड़
दिया
है
कश्ती,
दरिया,
भँवर,
किनारा
Siddharth Saaz
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यहाँ
तुम
देखना
रुतबा
हमारा
हमारी
रेत
है
दरिया
हमारा
Kushal Dauneria
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दरिया
के
किनारे
पे
मिरी
लाश
पड़ी
थी
और
पानी
की
तह
में
वो
मुझे
ढूँड
रहा
था
Adil Mansuri
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इस
नदी
की
धार
में
ठंडी
हवा
आती
तो
है
नाव
जर्जर
ही
सही,
लहरों
से
टकराती
तो
है
Dushyant Kumar
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कभी
मुझ
सेे
रूठा
कभी
बात
की
यही
हद
रही
उसके
ज़ुल्मात
की
गले
से
वो
आकर
के
लग
जाएगा
करेगा
वो
बातें
बिना
बात
की
न
तो
हाथ
पकड़ा
न
नज़रें
मिलीं
ये
किस
तरह
की
फिर
मुलाक़ात
की
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anupam shah
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चाह
ली
आज
रौशनी
मैंने
एक
बेफ़िक्र
ज़िन्दगी
मैंने
बाम
पर
फिर
दिया
जलाया
है
आपकी
राह
फिर
तकी
मैंने
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anupam shah
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शराबों
से
ख़ुमारी
आ
रही
है
नशा
तेरा
उतरता
जा
रहा
है
anupam shah
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इक
इक
मिसरे
में
करनी
हैं
तुम
सेे
कुछ
बातें
करनी
हैं
शाम
ढले
तुम
आओ
मिलने
मिलकर
के
रातें
करनी
हैं
इक
अरसे
से
अश्क
सँभाले
हमको
बरसातें
करनी
हैं
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anupam shah
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शोर
की
जब
ये
आदत
हमें
हो
गई
बज़्म
तन्हा
हमें
कर
के
ख़ुद
सो
गई
सब
सेे
मिलता
रहा
नाम
लेकर
तेरा
ये
ख़ता
मुझ
सेे
सौ
मर्तबा
हो
गई
टूटकर
के
मैं
सच
को
दिखाता
रहा
आइनो
सी
मेरी
ज़िन्दगी
हो
गई
उसकी
इक
मुस्कुराहट
को
तड़पे
बहुत
वो
ख़फ़ा
जब
हुई
आप
ही
रो
गई
एक
तितली
जो
थी
फूल
पर
बस
फ़िदा
उड़
गईं
खुशबुएँ
बे-वफ़ा
हो
गई
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anupam shah
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