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Siraj Faisal Khan
tire ehsaas men dooba hua main
tire ehsaas men dooba hua main | तिरे एहसास में डूबा हुआ मैं
- Siraj Faisal Khan
तिरे
एहसास
में
डूबा
हुआ
मैं
कभी
सहरा
कभी
दरिया
हुआ
मैं
- Siraj Faisal Khan
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हैं
लहू
से
कई
गुना
बढ़कर
वो
जो
एहसास
के
मरासिम
हैं
Shadan Ahsan Marehrvi
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साँस
लेती
हूँ
तो
यूँँ
महसूस
होता
है
मुझे
जैसे
मेरे
दिल
की
हर
धड़कन
में
शामिल
आप
हैं
Jaan Nisar Akhtar
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इस
क़दर
हम
ख़ुश
रखेंगे
आपको
ससुराल
में
आपको
महसूस
होगा
जी
रहे
ननिहाल
में
दो
गुलाबों
की
तरह
है
दो
चमेली
की
तरह
फ़र्क़
बस
इतना
तुम्हारे
होंठ
में
और
गाल
में
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Tanoj Dadhich
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इसी
लिए
हमें
एहसास-ए-जुर्म
है
शायद
अभी
हमारी
मोहब्बत
नई
नई
है
ना
Afzal Khan
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जज़्बातों
को
सहज
लफ्ज़ों
में
पिरोता
हूँ
मैं
लिखता
फ़क़त
वही
हूँ
जो
सच
में
होता
हूँ
मैं
Harsh saxena
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ऐसा
नहीं
कि
उन
से
मोहब्बत
नहीं
रही
जज़्बात
में
वो
पहली
सी
शिद्दत
नहीं
रही
Khumar Barabankvi
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लाई
है
किस
मक़ाम
पे
ये
ज़िंदगी
मुझे
महसूस
हो
रही
है
ख़ुद
अपनी
कमी
मुझे
Ali Ahmad Jalili
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ग़म
और
ख़ुशी
में
फ़र्क़
न
महसूस
हो
जहाँ
मैं
दिल
को
उस
मक़ाम
पे
लाता
चला
गया
Sahir Ludhianvi
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जैसे
मेरी
निगाह
ने
देखा
न
हो
कभी
महसूस
ये
हुआ
तुझे
हर
बार
देख
कर
Shad Azimabadi
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महसूस
कर
रहा
था
उसे
अपने
आस
पास
अपना
ख़याल
ख़ुद
ही
बदलना
पड़ा
मुझे
Ameer Qazalbash
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वो
उजला
हो
कि
मैला
हो
या
महँगा
हो
कि
सस्ता
हो
ये
माँ
का
सर
है
इस
पर
हर
दुपट्टा
मुस्कुराता
है
Siraj Faisal Khan
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वो
कभी
आग़ाज़
कर
सकते
नहीं
ख़ौफ़
लगता
है
जिन्हें
अंजाम
से
Siraj Faisal Khan
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मैं
इस
ख़याल
से
शर्मिंदगी
में
डूब
गया
कि
मेरे
होते
हुए
वो
नदी
में
डूब
गया
Siraj Faisal Khan
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जब
से
हासिल
हुआ
है
वो
मुझ
को
ख़्वाब
आने
लगे
बिछड़ने
के
Siraj Faisal Khan
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हौसले
थे
कभी
बुलंदी
पर
अब
फ़क़त
बेबसी
बुलंदी
पर
ख़ाक
में
मिल
गई
अना
सब
की
चढ़
गई
थी
बड़ी
बुलंदी
पर
फिर
ज़मीं
पर
बिखर
गई
आ
कर
धूप
कुछ
पल
रही
बुलंदी
पर
खिल
रही
है
तमाम
ख़ुशियों
में
इक
तुम्हारी
कमी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
से
यही
समझते
थे
है
बहुत
रौशनी
बुलंदी
पर
गिर
गई
हैं
समाज
की
क़द्रें
चढ़
गया
आदमी
बुलंदी
पर
ज़िंदगी
देख
कर
हुई
हैरान
आ
गई
मौत
भी
बुलंदी
पर
मुझ
से
सहरा
पनाह
माँगे
है
देख
वहशत
मेरी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
पर
गिरे
बुलंदी
से
ख़ाक
उड़
कर
गई
बुलंदी
पर
एक
दिल
पर
कभी
हुकूमत
थी
या'नी
मैं
था
कभी
बुलंदी
पर
खल
रही
है
कुछ
एक
लोगों
को
मेरी
मौजूदगी
बुलंदी
पर
है
ख़ुदा
सामने
मेरे
मौजूद
आ
गई
बंदगी
बुलंदी
पर
खिल
रही
है
तमाम
ख़ुशियों
में
इक
तुम्हारी
कमी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
से
यही
समझते
थे
है
बहुत
रौशनी
बुलंदी
पर
गिर
गई
हैं
समाज
की
क़द्रें
चढ़
गया
आदमी
बुलंदी
पर
ज़िंदगी
देख
कर
हुई
हैरान
आ
गई
मौत
भी
बुलंदी
पर
मुझ
से
सहरा
पनाह
माँगे
है
देख
वहशत
मेरी
बुलंदी
पर
हम
ज़मीं
पर
गिरे
बुलंदी
से
ख़ाक
उड़
कर
गई
बुलंदी
पर
एक
दिल
पर
कभी
हुकूमत
थी
या'नी
मैं
था
कभी
बुलंदी
पर
खल
रही
है
कुछ
एक
लोगों
को
मेरी
मौजूदगी
बुलंदी
पर
है
ख़ुदा
सामने
मेरे
मौजूद
आ
गई
बंदगी
बुलंदी
पर
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Siraj Faisal Khan
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