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anupam shah
kahaanii nayi roz likhkar mitaanina aasaan hai ye meri zindagaani
kahaanii nayi roz likhkar mitaanina aasaan hai ye meri zindagaani | कहानी नई रोज़ लिखकर मिटानी
- anupam shah
कहानी
नई
रोज़
लिखकर
मिटानी
न
आसान
है
ये
मेरी
ज़िंदगानी
ज़रा
सोचकर
इश्क़
करना
यहाँ
तुम
रिवायत
पड़ेगी
ये
तुमको
निभानी
ये
नाज़ुक
ग़ज़ल
और
शराफ़त
के
क़िस्से
किसी
की
हैं
बातें
किसी
की
कहानी
कई
रोज़
के
बाद
उन
सेे
मिले
जब
न
मुँह
से
निकाली
वो
बातें
पुरानी
करो
याद
मौसम
ज़रा
वो
पुराना
वो
भीगे
बदन
पे
पिघलता
सा
पानी
- anupam shah
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नींद
के
दायरे
में
हाज़िर
हूँ
ख़्वाब
के
रास्ते
में
हाज़िर
हूँ
याद
है
इश्क़
था
कभी
मुझ
सेे
मैं
उसी
सिलसिले
में
हाज़िर
हूँ
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Ejaz Tawakkal Khan
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फिर
उसी
सितमगर
को
याद
कर
रहे
हैं
हम
यानी
बे-वजह
ग़म
ईजाद
कर
रहे
हैं
हम
Harsh saxena
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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जबकि
मैंने
इश्क़
में
मरने
का
वा'दा
कर
लिया
तब
लगा
मुझको
कि
मैंने
इश्क़
ज़्यादा
कर
लिया
Siddharth Saaz
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दिल
आबाद
कहाँ
रह
पाए
उस
की
याद
भुला
देने
से
कमरा
वीराँ
हो
जाता
है
इक
तस्वीर
हटा
देने
से
Jaleel 'Aali'
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वफ़ा
करेंगे
निबाहेंगे
बात
मानेंगे
तुम्हें
भी
याद
है
कुछ
ये
कलाम
किस
का
था
Dagh Dehlvi
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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अपना
बचपन
भूल
बैठा
हूँ
मगर
अब
भी
तेरा
रोल
नंबर
याद
है
Salman Zafar
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हमारे
दिल
में
तुम
गहरे
न
उतरो
किसी
की
याद
का
गोदाम
होगा
Tanoj Dadhich
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आप
की
याद
आती
रही
रात
भर
चश्म-ए-नम
मुस्कुराती
रही
रात
भर
Makhdoom Mohiuddin
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मोहब्बत
में
इज़ाफ़ा
हो
रहा
है
मगर
ख़र्चा
ज़ियादा
हो
रहा
है
anupam shah
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क्या
हुआ
क्यूँ
ख़फ़ा
हो
गई
ज़िन्दगी
क्या
बना
क्या
मिटा
क्या
हुई
ज़िन्दगी
आपको
गर
मिले
तो
बताना
हमें
ढूंढता
हूँ
जो
है
खो
गई
ज़िन्दगी
लिख
के
फेंकू
इसे
फिर
नई
सी
लिखूं
ज़िन्दगी
का
मसौदा
हुई
ज़िन्दगी
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anupam shah
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हाथ
पकड़ूँ
या
कि
आँखों
को
मैं
उसकी
चूम
लूँ
अब
उसे
कहने
की
ख़ातिर
और
कुछ
तो
है
नहीं
anupam shah
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मुहब्बत
को
निभा
देता
तमाशाई
मेरे
जैसा
कभी
तूने
किया
होता
यूँँ
वा'दा
ही
मेरे
जैसा
मुझे
भी
राह
में
चलते
हुए
मिल
जाएगी
मंज़िल
तुम्हें
भी
फिर
कहीं
मिल
जाएगा
कोई
मेरे
जैसा
मुझे
हर
हाथ
ने
कुछ
इस
तरह
से
अब
तराशा
है
न
मुझ
में
रह
गया
हूँ
मैं
कहीं
बाक़ी
मेरे
जैसा
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anupam shah
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एक
तो
हम
ज़रा
ख़राब
नहीं
ये
भी
तो
कोई
कम
अज़ाब
नहीं
कामयाबी
की
कोई
कोशिश
है
और
हम
उस
में
कामयाब
नहीं
रूठ
जाती
है
रातरानी
जो
ख़ुशबुएँ
और
भी
ख़राब
नहीं
एक
तेरी
नज़र
से
डरता
हूँ
वैसे
ये
भी
तो
कम
शराब
नहीं
और
कितने
फ़ितूर
तारी
हैं,
एक
से
ज़िंदगी
ख़राब
नहीं
मौत
आएगी
जान
जाएगी
शम'अ
बुझती
है
आफ़ताब
नहीं
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anupam shah
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