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anupam shah
kya hua kyuuñ khafa ho gaii zindagi
kya hua kyuuñ khafa ho gaii zindagi | क्या हुआ क्यूँ ख़फ़ा हो गई ज़िन्दगी
- anupam shah
क्या
हुआ
क्यूँ
ख़फ़ा
हो
गई
ज़िन्दगी
क्या
बना
क्या
मिटा
क्या
हुई
ज़िन्दगी
आपको
गर
मिले
तो
बताना
हमें
ढूंढता
हूँ
जो
है
खो
गई
ज़िन्दगी
लिख
के
फेंकू
इसे
फिर
नई
सी
लिखूं
ज़िन्दगी
का
मसौदा
हुई
ज़िन्दगी
- anupam shah
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ग़ुस्से
में
भींच
लेता
है
बाँहों
में
अपनी
वो
क्या
सोचना
है
फिर
उसे
ग़ुस्सा
दिलाइए
Pooja Bhatia
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ये
जो
दुनिया
है
इसे
इतनी
इजाज़त
कब
है
हम
पे
अपनी
ही
किसी
बात
का
ग़ुस्सा
उतरा
Abhishek shukla
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जो
रहे
थे
खफ़ा-खफ़ा
हम
सेे
कह
गए
हमको
बे-वफ़ा
हम
सेे
राह
तकते
रहे
थे
फिर
भी
वो
नईं
मिले
आख़िरी
दफ़ा
हम
सेे
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Shivam Mishra
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आज
भी
वो
वो
ही
है
और
अदा
भी
वो
ही
है
बे-वफ़ा
भी
वो
ही
है
और
ख़फ़ा
भी
वो
ही
है
Aatish Indori
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किस
किस
को
बताएँगे
जुदाई
का
सबब
हम
तू
मुझ
से
ख़फ़ा
है
तो
ज़माने
के
लिए
आ
Ahmad Faraz
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ख़फ़ा
हैं
फिर
भी
आ
कर
छेड़
जाते
हैं
तसव्वुर
में
हमारे
हाल
पर
कुछ
मेहरबानी
अब
भी
होती
है
Akhtar Shirani
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देर
से
आने
पर
वो
ख़फ़ा
था
आख़िर
मान
गया
आज
मैं
अपने
बाप
से
मिलने
क़ब्रिस्तान
गया
Afzal Khan
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हवा
ख़फ़ा
थी
मगर
इतनी
संग-दिल
भी
न
थी
हमीं
को
शमा
जलाने
का
हौसला
न
हुआ
Qaisar-ul-Jafri
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यूँँ
लगे
दोस्त
तिरा
मुझ
से
ख़फ़ा
हो
जाना
जिस
तरह
फूल
से
ख़ुशबू
का
जुदा
हो
जाना
Qateel Shifai
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अभी
से
मेरे
रफ़ूगर
के
हाथ
थकने
लगे
अभी
तो
चाक
मिरे
ज़ख़्म
के
सिले
भी
नहीं
ख़फ़ा
अगरचे
हमेशा
हुए
मगर
अब
के
वो
बरहमी
है
कि
हम
से
उन्हें
गिले
भी
नहीं
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Parveen Shakir
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तितर-बितर
सी
ज़िन्दगी
कभी
सुलझ
नहीं
सकी
ये
ज़ुल्फ़
किस
तरह
तिरी
सुलझ
गई
मुझे
बता
anupam shah
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है
मुझको
रश्क़
तेरी
पाँव
की
पायल
से
इतना
यूँँ
लिपट
कर
पाँव
से
तेरे
ये
इतना
नाचती
क्यूँँ
है
anupam shah
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अधूरी
बात
का
मतलब
बनाकर
वो
झगड़ा
भी
मुझी
को
सब
बनाकर
उसे
फिर
बारहा
यूँँ
चूमता
था
मैं
काग़ज़
पर
तिरे
दो
लब
बनाकर
ज़माने
भर
से
हम
तो
लड़
गए
थे
तुम्हारी
बात
को
मज़हब
बनाकर
मिरा
क्या
है
मैं
बातों
का
धनी
हूँ
कि
जब
चाहो
कहूंगा
तब
बनाकर
ये
मैने
क्या
किया
है
ज़िन्दगी
का
सबा
को
जी
गया
हूँ
शब
बनाकर
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anupam shah
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अभी
बरसों
लगेंगे
तुम
सेे
होने
में
जुदा
मुझको
अभी
तक
आहटों
पे
चौंकने
का
काम
जारी
है
anupam shah
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एक
तो
हम
ज़रा
ख़राब
नहीं
ये
भी
तो
कोई
कम
अज़ाब
नहीं
कामयाबी
की
कोई
कोशिश
है
और
हम
उस
में
कामयाब
नहीं
रूठ
जाती
है
रातरानी
जो
ख़ुशबुएँ
और
भी
ख़राब
नहीं
एक
तेरी
नज़र
से
डरता
हूँ
वैसे
ये
भी
तो
कम
शराब
नहीं
और
कितने
फ़ितूर
तारी
हैं,
एक
से
ज़िंदगी
ख़राब
नहीं
मौत
आएगी
जान
जाएगी
शम'अ
बुझती
है
आफ़ताब
नहीं
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anupam shah
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