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anupam shah
jaane ka jo gham hota hai
jaane ka jo gham hota hai | जाने का जो ग़म होता है
- anupam shah
जाने
का
जो
ग़म
होता
है
तेज
कभी
मद्धम
होता
है
तुम
सेे
बिछड़कर
जाना
हमने
आँख
का
आँसू
नम
होता
है
- anupam shah
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तू
अपने
सारे
दुख
जाकर
बताता
है
जिन्हें,
इक
दिन
बढ़ाएँगे
वही
ग़म-ख़्वार
तेरी
आँख
का
पानी
Siddharth Saaz
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मुझे
तो
उसका
भीतरी
ग़ुबार
है
निकालना
सो
आँख
चूमता
हूँ
उसके
होंठ
चूमता
नहीं
Siddharth Saaz
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तुम्हें
ज़रूर
कोई
चाहतों
से
देखेगा
मगर
वो
आँखें
हमारी
कहाँ
से
लाएगा
तुम्हारे
साथ
ये
मौसम
फ़रिश्तों
जैसा
है
तुम्हारे
बा'द
ये
मौसम
बहुत
सताएगा
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Bashir Badr
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जब
भी
माँगूँ
तेरी
ख़ुशी
माँगूँ
और
दुआएँ
ख़ुदा
तलक
जाएँ
ख़्वाब
आएँ
तो
नींद
यूँँ
महके
आँख
से
ख़ुशबुएँ
छलक
जाएँ
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Ritesh Rajwada
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है
राम
के
वजूद
पे
हिन्दोस्ताँ
को
नाज़
अहल-ए-नज़र
समझते
हैं
उस
को
इमाम-ए-हिंद
Allama Iqbal
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वफ़ा
नज़र
नहीं
आती
कहीं
ज़माने
में
वफ़ा
का
ज़िक्र
किताबों
में
देख
लेते
हैं
Hafeez Banarasi
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इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
shampa andaliib
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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अलग
बैठे
थे
फिर
भी
आँख
साक़ी
की
पड़ी
हम
पर
अगर
है
तिश्नगी
कामिल
तो
पैमाने
भी
आएँगे
Majrooh Sultanpuri
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यूँँ
तो
वो
शख़्स
बिलकुल
बे-गुनह
है
ज़माने
की
मगर
उस
पे
निगह
है
हमारे
दरमियाँ
जो
दूरियाँ
हैं
यक़ीनन
तीसरी
कोई
वजह
है
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Dileep Kumar
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हो
गए
बेहोश
बेख़ुद
और
बेसुध
इश्क़
में
इस
से
ज़्यादा
क्या
डुबोयेगी
हमें
ये
मयकशी
anupam shah
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कहानी
नई
रोज़
लिखकर
मिटानी
न
आसान
है
ये
मेरी
ज़िंदगानी
ज़रा
सोचकर
इश्क़
करना
यहाँ
तुम
रिवायत
पड़ेगी
ये
तुमको
निभानी
ये
नाज़ुक
ग़ज़ल
और
शराफ़त
के
क़िस्से
किसी
की
हैं
बातें
किसी
की
कहानी
कई
रोज़
के
बाद
उन
सेे
मिले
जब
न
मुँह
से
निकाली
वो
बातें
पुरानी
करो
याद
मौसम
ज़रा
वो
पुराना
वो
भीगे
बदन
पे
पिघलता
सा
पानी
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anupam shah
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तितर-बितर
सी
ज़िन्दगी
कभी
सुलझ
नहीं
सकी
ये
ज़ुल्फ़
किस
तरह
तिरी
सुलझ
गई
मुझे
बता
anupam shah
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अभी
हम
सेे
रूठे
अभी
वो
ख़फ़ा
है
ज़बाँ
से
वो
अपनी
नहीं
बे-वफ़ा
है
हमारे
तो
जीने
का
ये
फ़लसफ़ा
है
न
कोई
ख़सारा
न
कोई
नफ़ा
है
तुम्हीं
याद
आना
न
आना
तुम्हारा
मोहब्बत
है
या
फिर
ये
कोई
जफ़ा
है
फ़ना
हो
चुके
हैं
मुहब्बत
में
हम
तो
ये
लाशों
का
सौदा
ही
अबकी
दफ़ा
है
बुरा
हो
भला
हो
तुम्हें
सोचते
हैं
कि
इस
सेे
बड़ी
भी
कहीं
कुछ
वफ़ा
है
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anupam shah
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ता'उम्र
वही
राज़
छुपाते
ही
रहे
हम
ता'उम्र
निगाहों
से
छलकता
ही
रहा
जो
anupam shah
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