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anupam shah
abhii hamse roothe abhii vo khafa hain
abhii hamse roothe abhii vo khafa hain | अभी हम सेे रूठे अभी वो ख़फ़ा है
- anupam shah
अभी
हम
सेे
रूठे
अभी
वो
ख़फ़ा
है
ज़बाँ
से
वो
अपनी
नहीं
बे-वफ़ा
है
हमारे
तो
जीने
का
ये
फ़लसफ़ा
है
न
कोई
ख़सारा
न
कोई
नफ़ा
है
तुम्हीं
याद
आना
न
आना
तुम्हारा
मोहब्बत
है
या
फिर
ये
कोई
जफ़ा
है
फ़ना
हो
चुके
हैं
मुहब्बत
में
हम
तो
ये
लाशों
का
सौदा
ही
अबकी
दफ़ा
है
बुरा
हो
भला
हो
तुम्हें
सोचते
हैं
कि
इस
सेे
बड़ी
भी
कहीं
कुछ
वफ़ा
है
- anupam shah
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वफ़ा
करेंगे
निबाहेंगे
बात
मानेंगे
तुम्हें
भी
याद
है
कुछ
ये
कलाम
किस
का
था
Dagh Dehlvi
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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इस
से
पहले
कि
बे-वफ़ा
हो
जाएँ
क्यूँँ
न
ऐ
दोस्त
हम
जुदा
हो
जाएँ
Ahmad Faraz
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उस
दुश्मन-ए-वफ़ा
को
दु'आ
दे
रहा
हूँ
मैं
मेरा
न
हो
सका
वो
किसी
का
तो
हो
गया
Hafeez Banarasi
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मेरे
ब'अद
वफ़ा
का
धोका
और
किसी
से
मत
करना
गाली
देगी
दुनिया
तुझ
को
सर
मेरा
झुक
जाएगा
Qateel Shifai
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चुप
रहते
हैं
चुप
रहने
दो
राज़
बताओ
खोले
क्या
बात
वफ़ा
की
तुम
करती
हो
बोलो
हम
कुछ
बोले
क्या
उल्फ़त
तो
अफ़साना
है
तुम
करती
खूब
सियासत
हो
हम
भी
हैं
मक़बूल
बहुत
अब
बोल
किसी
के
होलें
क्या
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Anand Raj Singh
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जो
दिल
रखते
हैं
सीने
में
वो
काफ़िर
हो
नहीं
सकते
मोहब्बत
दीन
होती
है
वफ़ा
ईमान
होती
है
Arzoo Lakhnavi
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तेरे
ख़त
आज
लतीफ़ों
की
तरह
लगते
हैं
ख़ूब
हँसता
हूँ
जहाँ
लफ़्ज-ए-वफ़ा
आता
है
Zubair Ali Tabish
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परेशाँ
है
वो
झूटा
इश्क़
कर
के
वफ़ा
करने
की
नौबत
आ
गई
है
Fahmi Badayuni
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'शाद'
ग़ैर-मुमकिन
है
शिकवा-ए-बुताँ
मुझ
से
मैं
ने
जिस
से
उल्फ़त
की
उस
को
बा-वफ़ा
पाया
Shaad Arfi
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आज
की
शाम
ज़रा
रात
तक
ठहर
जाए
काश
ऐसा
भी
हो
ये
चांँद
भी
न
घर
जाए
anupam shah
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शोर
की
जब
ये
आदत
हमें
हो
गई
बज़्म
तन्हा
हमें
कर
के
ख़ुद
सो
गई
सब
सेे
मिलता
रहा
नाम
लेकर
तेरा
ये
ख़ता
मुझ
सेे
सौ
मर्तबा
हो
गई
टूटकर
के
मैं
सच
को
दिखाता
रहा
आइनो
सी
मेरी
ज़िन्दगी
हो
गई
उसकी
इक
मुस्कुराहट
को
तड़पे
बहुत
वो
ख़फ़ा
जब
हुई
आप
ही
रो
गई
एक
तितली
जो
थी
फूल
पर
बस
फ़िदा
उड़
गईं
खुशबुएँ
बे-वफ़ा
हो
गई
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anupam shah
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तुम्हें
मैं
बस
तुम्हारी
सम्त
रखकर
लौट
आऊँगा
मुझे
मालूम
है
जो
दर्द
है
रस्ता
भटकने
का
anupam shah
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तुम्हें
सोचकर
के
मैं
यूँँ
खिल
रहा
हूँ
कि
करवट
बदल
कर
तुम्हें
मिल
रहा
हूँ
वो
जिस
पर
से
लौटे
हैं
सारे
मुसाफ़िर
मैं
ऐसे
ही
दरिया
का
साहिल
रहा
हूँ
बहुत
वक़्त
बीता
समझने
में
ये
भी
मैं
आसाँ
रहा
हूँ
या
मुश्किल
रहा
हूँ
मुझे
छोड़ने
का
गुमाँ
यूँँ
न
करना
न
जाने
मैं
कितनों
की
मंज़िल
रहा
हूँ
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anupam shah
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ज़िन्दगी
इस
तरह
ही
लुटाता
रहा
प्यार
खोता
रहा
प्यार
पाता
रहा
एक
मंज़र
ने
यूँँ
रोक
दी
ज़िंदगी
बारहा
सामने
मेरे
आता
रहा
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anupam shah
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