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anupam shah
zindagi is tarah hi lutaata raha
zindagi is tarah hi lutaata raha | ज़िन्दगी इस तरह ही लुटाता रहा
- anupam shah
ज़िन्दगी
इस
तरह
ही
लुटाता
रहा
प्यार
खोता
रहा
प्यार
पाता
रहा
एक
मंज़र
ने
यूँँ
रोक
दी
ज़िंदगी
बारहा
सामने
मेरे
आता
रहा
- anupam shah
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मौत
ही
इंसान
की
दुश्मन
नहीं
ज़िंदगी
भी
जान
ले
कर
जाएगी
Arsh Malsiyani
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जान
भी
अब
दिल
पे
वारी
जाएगी
ये
बला
सर
से
उतारी
जाएगी
एक
पल
तुझ
बिन
गुज़रना
है
कठिन
ज़िन्दगी
कैसे
गुज़ारी
जाएगी
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Anjum Rehbar
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ये
ज़मीं
किस
क़दर
सजाई
गई
ज़िंदगी
की
तड़प
बढ़ाई
गई
आईने
से
बिगड़
के
बैठ
गए
जिन
की
सूरत
जिन्हें
दिखाई
गई
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Sahir Ludhianvi
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उसके
जाने
और
आने
में
फ़क़त
यह
फ़र्क़
है
दूर
जाती
मौत
है
तो
पास
आती
ज़िन्दगी
Divy Kamaldhwaj
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कोई
ख़ामोश
ज़ख़्म
लगती
है
ज़िन्दगी
एक
नज़्म
लगती
है
Gulzar
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लाई
है
किस
मक़ाम
पे
ये
ज़िंदगी
मुझे
महसूस
हो
रही
है
ख़ुद
अपनी
कमी
मुझे
Ali Ahmad Jalili
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ज़िंदगी
में
आई
वो
जैसे
मेरी
तक़दीर
हो
और
उसी
तक़दीर
से
फिर
चोट
खाना
याद
है
Rohit tewatia 'Ishq'
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ज़िंदगी
यूँँही
बहुत
कम
है
मोहब्बत
के
लिए
रूठ
कर
वक़्त
गँवाने
की
ज़रूरत
क्या
है
Unknown
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तुम
भी
साबित
हुए
कमज़ोर
मुनव्वर
राना
ज़िन्दगी
माँगी
भी
तुमने
तो
दवा
से
माँगी
Munawwar Rana
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ज़िंदगी
तुझ
से
भी
क्या
ख़ूब
त'अल्लुक़
है
मिरा
जैसे
सूखे
हुए
पत्ते
से
हवा
का
रिश्ता
Khalish Akbarabadi
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चलो
फिर
इश्क़
करते
हैं,
रगों
में
आग
भरते
हैं
अभी
उबरे
कहाँ
थे
तुम,
चलो
फिर
डूब
मरते
हैं
कभी
दिल
हो
तो
आना
लौटकर
मेरे
ही
कूचे
पर
सुना
है
दिलजले
'आशिक़
मोहब्बत
ख़ूब
करते
हैं
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anupam shah
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इन
रास्तों
पे
अब
मैं
बेबस
सा
हो
खड़ा
हूँ
लगता
है
जैसे
मुश्किल
से
वक़्त
में
पड़ा
हूँ
मैं
घर
को
बंद
कर
के
अक्सर
ये
सोचता
हूँ
जाना
कहाँ
था
मुझको
किस
ओर
चल
पड़ा
हूँ
वो
दूर
का
मुसाफ़िर
जाना
है
दूर
उसको
नाहक़
ही
रास्तों
को
मैं
रोक
के
खड़ा
हूँ
औरों
के
वासते
तो
छोड़ा
बहुत
है
रस्ता
बस
बात
अब
है
अपनी
तो
ज़िद
पे
मैं
अड़ा
हूँ
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anupam shah
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तुम्हारे
कान
के
झुमके
से
मुझको
रश्क़
ऐसे
है
कभी
गर्दन
को
छूता
है
कभी
गालों
को
चू
में
है
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anupam shah
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हज़ारों
बार
मर
मर
कर
यही
इक
फ़लसफ़ा
जाना
कि
जब
तक
ज़िंदगी
है
तब
तलक
जीना
ज़रूरी
है
anupam shah
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कहानी
नई
रोज़
लिखकर
मिटानी
न
आसान
है
ये
मेरी
ज़िंदगानी
ज़रा
सोचकर
इश्क़
करना
यहाँ
तुम
रिवायत
पड़ेगी
ये
तुमको
निभानी
ये
नाज़ुक
ग़ज़ल
और
शराफ़त
के
क़िस्से
किसी
की
हैं
बातें
किसी
की
कहानी
कई
रोज़
के
बाद
उन
सेे
मिले
जब
न
मुँह
से
निकाली
वो
बातें
पुरानी
करो
याद
मौसम
ज़रा
वो
पुराना
वो
भीगे
बदन
पे
पिघलता
सा
पानी
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anupam shah
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