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anupam shah
tumhaare kaan ke jhumke se mujhko rasq aise hai
tumhaare kaan ke jhumke se mujhko rasq aise hai | तुम्हारे कान के झुमके से मुझको रश्क़ ऐसे है
- anupam shah
तुम्हारे
कान
के
झुमके
से
मुझको
रश्क़
ऐसे
है
कभी
गर्दन
को
छूता
है
कभी
गालों
को
चू
में
है
- anupam shah
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मुझे
हर
हाथ
ने
कुछ
इस
तरह
से
अब
तराशा
है
न
मुझ
में
रह
गया
हूँ
मैं
कहीं
बाक़ी
मिरे
जैसा
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anupam shah
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लड़खड़ाते
लफ़्ज़
हैं
और
चाल
बेपरवाह
है
बेख़ुदी
ये
किस
तरह
की
किस
तरह
की
चाह
है
धूप
बारिश
और
गर्मी
तीनों
हमपे
आ
पड़े
इतना
मुश्किल
हो
चला
है
कौन
सा
ये
माह
है
बल
नहीं
तेरी
कमर
के
कोई
तीखे
मोड़
हैं
जो
भी
'आशिक़
रस्ता
भटका
अब
तलक
गुमराह
है
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anupam shah
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तू
ही
हर
ज़ख़्म
देता
है
तू
ही
मरहम
लगाता
है
बड़ा
बेदिल
ख़ुदा
है
तू
ख़ुदा
होना
जताता
है
ये
वादे
प्यार
के
फूलों
से
नाज़ुक
क्यूँ
बनाता
है
वफ़ा
की
राह
में
कांटे
ही
कांटे
क्यूँ
बिछाता
है
ज़बाँ
ने
तो
तेरी
इक
उम्र
मुझ
सेे
झूठ
बोला
है
मुझे
तो
बस
गिला
तेरी
निगाहों
का
सताता
है
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anupam shah
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क्या
हुआ
क्यूँ
ख़फ़ा
हो
गई
ज़िन्दगी
क्या
बना
क्या
मिटा
क्या
हुई
ज़िन्दगी
आपको
गर
मिले
तो
बताना
हमें
ढूंढता
हूँ
जो
है
खो
गई
ज़िन्दगी
लिख
के
फेंकू
इसे
फिर
नई
सी
लिखूं
ज़िन्दगी
का
मसौदा
हुई
ज़िन्दगी
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anupam shah
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हसीं
कुछ
ख़्वाब
आँखों
को
कभी
सस्ते
नहीं
मिलते
कभी
मंज़िल
नहीं
मिलती
कभी
रस्ते
नहीं
मिलते
anupam shah
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