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anupam shah
tumhein main bas tumhaari samt rakhkar laut aaunga
tumhein main bas tumhaari samt rakhkar laut aaunga | तुम्हें मैं बस तुम्हारी सम्त रखकर लौट आऊँगा
- anupam shah
तुम्हें
मैं
बस
तुम्हारी
सम्त
रखकर
लौट
आऊँगा
मुझे
मालूम
है
जो
दर्द
है
रस्ता
भटकने
का
- anupam shah
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पास
जब
तक
वो
रहे
दर्द
थमा
रहता
है
फैलता
जाता
है
फिर
आँख
के
काजल
की
तरह
Parveen Shakir
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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ज़ख़्म
दिल
पर
हज़ार
करता
है
और
कहता
है
प्यार
करता
है
दर्द
दिल
में
उतर
गया
कैसे
कोई
अपना
ही
वार
करता
है
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Santosh S Singh
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हम
आह
भी
करते
हैं
तो
हो
जाते
हैं
बदनाम
वो
क़त्ल
भी
करते
हैं
तो
चर्चा
नहीं
होता
Akbar Allahabadi
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किस
ने
हमारे
शहर
पे
मारी
है
रौशनी
हर
इक
मकाँ
के
ज़ख़्म
से
जारी
है
रौशनी
Nomaan Shauque
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इस
क़दर
जज़्ब
हो
गए
दोनों
दर्द
खेंचूँ
तो
दिल
निकल
आए
Abbas Qamar
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वो
रातें
चाँद
के
साथ
गईं
वो
बातें
चाँद
के
साथ
गईं
अब
सुख
के
सपने
क्या
देखें
जब
दुख
का
सूरज
सर
पर
हो
Ibn E Insha
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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जिसकी
ख़ातिर
कितनी
रातें
सुलगाई
जिसके
दुख
में
दिल
जाने
क्यूँ
रोता
है
इक
दिन
हम
सेे
पूछ
रही
थी
वो
लड़की
प्यार
में
कोई
पागल
कैसे
होता
है
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Ritesh Rajwada
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दिल
हिज्र
के
दर्द
से
बोझल
है
अब
आन
मिलो
तो
बेहतर
हो
इस
बात
से
हम
को
क्या
मतलब
ये
कैसे
हो
ये
क्यूँँकर
हो
Ibn E Insha
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ज़िन्दगी
इस
तरह
ही
लुटाता
रहा
प्यार
खोता
रहा
प्यार
पाता
रहा
एक
मंज़र
ने
यूँँ
रोक
दी
ज़िंदगी
बारहा
सामने
मेरे
आता
रहा
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anupam shah
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तुम्हारे
वासते
जो
अब
नहीं
क़ाबिल
रहा
हूँ
मैं
उन्हें
पूछो
ज़रा
जिनके
लिए
मुश्किल
रहा
हूँ
मैं
भटकता
फिर
रहा
हूँ
बाद
तेरे
इस
तरह
से
मैं
कभी
दरया
कभी
कश्ती
कभी
साहिल
रहा
हूँ
मैं
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anupam shah
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लो
ख़ुद
मुख़्तार
होकर
देखते
हैं
कि
अपने
यार
होकर
देखते
हैं
बचे
बर्बाद
होने
से
हैं
अब
तक
चलो
इस
बार
होकर
देखते
हैं
यहाँ
से
मसअला
ये
हल
न
होगा
इसे
उस
पार
होकर
देखते
हैं
कोई
ख़तरा
नहीं
है
दुश्मनी
में
किसी
का
प्यार
होकर
देखते
हैं
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anupam shah
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दिल
ही
दिल
में
न
बातें
बनाया
करो
सामने
जब
हो
तो
कुछ
बताया
करो
अपनी
मस्ती
में
बस्ती
बसाया
करो
जो
जले
दिल
किसी
का
जलाया
करो
ख़ल्वतों
में
है
जीने
की
बस
ये
अदा
आइना
देखकर
मुस्कुराया
करो
बात
करने
का
है
बस
सलीक़ा
यही
एक
सुन
कर
के
दूजी
सुनाया
करो
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anupam shah
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यही
इक
काम
करके
दूरियां
भी
वो
बढ़ाती
है
है
मेरा
नाम
लेती
और
फिर
वो
'जी'
लगाती
है
anupam shah
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