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anupam shah
tumhaare vaaste jo ab nahin qabil raha hooñ main
tumhaare vaaste jo ab nahin qabil raha hooñ main | तुम्हारे वासते जो अब नहीं क़ाबिल रहा हूँ मैं
- anupam shah
तुम्हारे
वासते
जो
अब
नहीं
क़ाबिल
रहा
हूँ
मैं
उन्हें
पूछो
ज़रा
जिनके
लिए
मुश्किल
रहा
हूँ
मैं
भटकता
फिर
रहा
हूँ
बाद
तेरे
इस
तरह
से
मैं
कभी
दरया
कभी
कश्ती
कभी
साहिल
रहा
हूँ
मैं
- anupam shah
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कैसे
कहें
कि
तुझ
को
भी
हम
से
है
वास्ता
कोई
तू
ने
तो
हम
से
आज
तक
कोई
गिला
नहीं
किया
Jaun Elia
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निभाया
जिस
सेे
भी
रिश्ता
तो
फिर
हद
में
रहे
हैं
हम
किसी
के
मखमली
तकिए
के
ऊपर
सर
नहीं
रक्खा
Nirbhay Nishchhal
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मेरी
जवानी
को
कमज़ोर
क्यूँ
समझते
हो
तुम्हारे
वास्ते
अब
भी
शबाब
बाक़ी
है
ये
और
बात
है
बोतल
ये
गिर
के
टूट
गई
मगर
अभी
भी
ज़रा
सी
शराब
बाक़ी
है
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Paplu Lucknawi
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फिर
उसके
बाद
कोई
सिलसिला
नहीं
रक्खा
जिसे
मुआ'फ़
किया,
राब्ता
नहीं
रक्खा
Renu Nayyar
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मुझको
जीने
का
हौसला
दीजे
वरना
रिश्तों
का
फ़ाएदा
क्या
है
Praveen Sharma SHAJAR
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धूप
भी
आराम
करती
थी
जहाँ
अपना
ऐसी
छाँव
से
नाता
रहा
Madan Mohan Danish
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क्या
जाने
किस
ख़ता
की
सज़ा
दी
गई
हमें
रिश्ता
हमारा
दार
पे
लटका
दिया
गया
शादी
में
सब
पसंद
का
लाया
गया
मगर
अपनी
पसंद
का
उसे
दूल्हा
नहीं
मिला
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Afzal Ali Afzal
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बाक़ी
नहीं
रहा
है
कोई
रब्त
शहरस
यानी
कि
ख़ुश
रहेंगे
यहाँ
ख़ुश
रहे
बग़ैर
pankaj pundir
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दुश्मनी
लाख
सही
ख़त्म
न
कीजे
रिश्ता
दिल
मिले
या
न
मिले
हाथ
मिलाते
रहिए
Nida Fazli
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पैसा
कमाने
आते
हैं
सब
राजनीति
में
आता
नहीं
है
कोई
भी
खोने
के
वास्ते
छम्मो
का
मुजरा
सुनते
हैं
नेता
जो
रात
भर
संसद
भवन
में
आते
हैं
सोने
के
वास्ते
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Paplu Lucknawi
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कहानी
नई
रोज़
लिखकर
मिटानी
न
आसान
है
ये
मेरी
ज़िंदगानी
ज़रा
सोचकर
इश्क़
करना
यहाँ
तुम
रिवायत
पड़ेगी
ये
तुमको
निभानी
ये
नाज़ुक
ग़ज़ल
और
शराफ़त
के
क़िस्से
किसी
की
हैं
बातें
किसी
की
कहानी
कई
रोज़
के
बाद
उन
सेे
मिले
जब
न
मुँह
से
निकाली
वो
बातें
पुरानी
करो
याद
मौसम
ज़रा
वो
पुराना
वो
भीगे
बदन
पे
पिघलता
सा
पानी
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anupam shah
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तुम्हें
मैं
बस
तुम्हारी
सम्त
रखकर
लौट
आऊँगा
मुझे
मालूम
है
जो
दर्द
है
रस्ता
भटकने
का
anupam shah
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अभी
बरसों
लगेंगे
तुम
सेे
होने
में
जुदा
मुझको
अभी
तक
आहटों
पे
चौंकने
का
काम
जारी
है
anupam shah
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तुम्हें
ख़्वाब
में
देखना
चाहता
हूँ
मैं
नादान
हूँ,
ये
मैं
क्या
चाहता
हूँ
मैं
देखूँ
तुम्हें
और
तुम
मान
जाओ
निगाहों
से
बस
बोलना
चाहता
हूँ
लिखा
तो
था
ख़त
में
निबाहोगे
तुम
भी
तुम्हारे
ख़तों
से
वफ़ा
चाहता
हूँ
ख़ता
है
अगर
इश्क़
करना
यहाँ
तो
मैं
करना
वही
बस
ख़ता
चाहता
हूँ
ये
नफ़रत
निभाना
नहीं
हमको
आता
मोहब्बत
मैं
सौ
मर्तबा
चाहता
हूँ
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anupam shah
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हम
ज़रा
बेख़याल
होते
हैं
हम
सेे
जब
भी
सवाल
होते
हैं
झूठ
कहते
हुए
नहीं
डरते
लोग
कितने
कमाल
होते
हैं
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anupam shah
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