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anupam shah
yahii ik kaam karke dooriyaan bhi vo badhaati hai
yahii ik kaam karke dooriyaan bhi vo badhaati hai | यही इक काम करके दूरियां भी वो बढ़ाती है
- anupam shah
यही
इक
काम
करके
दूरियां
भी
वो
बढ़ाती
है
है
मेरा
नाम
लेती
और
फिर
वो
'जी'
लगाती
है
- anupam shah
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हम
ज़रा
बेख़याल
होते
हैं
हम
सेे
जब
भी
सवाल
होते
हैं
झूठ
कहते
हुए
नहीं
डरते
लोग
कितने
कमाल
होते
हैं
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anupam shah
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अधूरी
बात
का
मतलब
बनाकर
वो
झगड़ा
भी
मुझी
को
सब
बनाकर
उसे
फिर
बारहा
यूँँ
चूमता
था
मैं
काग़ज़
पर
तिरे
दो
लब
बनाकर
ज़माने
भर
से
हम
तो
लड़
गए
थे
तुम्हारी
बात
को
मज़हब
बनाकर
मिरा
क्या
है
मैं
बातों
का
धनी
हूँ
कि
जब
चाहो
कहूंगा
तब
बनाकर
ये
मैने
क्या
किया
है
ज़िन्दगी
का
सबा
को
जी
गया
हूँ
शब
बनाकर
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anupam shah
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इस
तरह
से
तुम्हें
मैं
ज़िंदगी
में
लाऊँगा
गीत
पर
गीत
लिख
के
रोज़
तुझको
गाऊँगा
एक
शायर
ने
तेरा
नाम
लिख
लिया
दिल
पे
और
फिर
क्या
हसीं
ग़ज़ल
तुझे
सुनाऊँगा
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anupam shah
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अभी
बरसों
लगेंगे
तुम
सेे
होने
में
जुदा
मुझको
अभी
तक
आहटों
पे
चौंकने
का
काम
जारी
है
anupam shah
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तुम्हारे
कान
के
झुमके
से
मुझको
रश्क़
ऐसे
है
कभी
गर्दन
को
छूता
है
कभी
गालों
को
चू
में
है
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anupam shah
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