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anupam shah
raat se roz lad rahe hain ham
raat se roz lad rahe hain ham | रात से रोज़ लड़ रहे हैं हम
- anupam shah
रात
से
रोज़
लड़
रहे
हैं
हम
एक
ही
ज़िद
पे
अड़
रहे
हैं
हम
- anupam shah
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क्या
हुआ
क्यूँ
ख़फ़ा
हो
गई
ज़िन्दगी
क्या
बना
क्या
मिटा
क्या
हुई
ज़िन्दगी
आपको
गर
मिले
तो
बताना
हमें
ढूंढता
हूँ
जो
है
खो
गई
ज़िन्दगी
लिख
के
फेंकू
इसे
फिर
नई
सी
लिखूं
ज़िन्दगी
का
मसौदा
हुई
ज़िन्दगी
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anupam shah
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बहुत
कुछ
खो
दिया
है
तब
कहीं
अब
ख़ुद
को
पाया
है
मिरी
जाँ
इश्क़
हो
या
दुश्मनी
अब
मैं
न
बदलूँगा
anupam shah
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कुछ
तिश्नगी
भी
ऐसे
मिटती
नहीं
हमारी
हक़
में
नहीं
समुंदर
के
प्यास
को
बुझाना
anupam shah
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ख़ुदा!
कैसा
मुक़द्दर
फेंककर
मुँह
पर
मिरे
मारा
बर्फ़
पर
हाथ
रखता
हूँ
तो
जलता
है
बदन
सारा
anupam shah
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इन
रास्तों
पे
अब
मैं
बेबस
सा
हो
खड़ा
हूँ
लगता
है
जैसे
मुश्किल
से
वक़्त
में
पड़ा
हूँ
मैं
घर
को
बंद
कर
के
अक्सर
ये
सोचता
हूँ
जाना
कहाँ
था
मुझको
किस
ओर
चल
पड़ा
हूँ
वो
दूर
का
मुसाफ़िर
जाना
है
दूर
उसको
नाहक़
ही
रास्तों
को
मैं
रोक
के
खड़ा
हूँ
औरों
के
वासते
तो
छोड़ा
बहुत
है
रस्ता
बस
बात
अब
है
अपनी
तो
ज़िद
पे
मैं
अड़ा
हूँ
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anupam shah
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