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anupam shah
ham jo har roz KHushi ko hi bulaate hain ghar
ham jo har roz KHushi ko hi bulaate hain ghar | हम जो हर रोज़ ख़ुशी को ही बुलाते हैं घर
- anupam shah
हम
जो
हर
रोज़
ख़ुशी
को
ही
बुलाते
हैं
घर
सिर्फ़
ग़म
हैं
जो
कभी
लौट
के
आते
हैं
घर
हम
सेे
इक
उम्र
तराशी
न
गई
तन्हाई
और
वो
हैं
कि
करीने
से
सजाते
हैं
घर
ये
जो
मैं
हूँ
न
संभलकर
के
पहुँचता
हूँ
घर
लोग
धुत
हैं
जो
नशे
में
वो
दिखाते
हैं
घर
वो
कोई
है
कि
जिसे
प्यार
सिखाते
हैं
हम
बाद
में
ख़ुद
ही
कहीं
और
बसाते
हैं
घर
- anupam shah
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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इतने
अफ़सुर्दा
नहीं
हैं
हम
कि
कर
लें
ख़ुद-कुशी
और
न
इतने
ख़ुश
कि
सच
में
मरने
की
ख़्वाहिश
न
हो
Charagh Sharma
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ज़िंदगी
कितनी
मसर्रत
से
गुज़रती
या
रब
ऐश
की
तरह
अगर
ग़म
भी
गवारा
होता
Akhtar Shirani
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चला
तो
हूँ
मैं
उन
के
दर
से
बिगड़
कर
हँसी
आ
रही
है
कि
आना
पड़ेगा
Khumar Barabankvi
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ग़म
और
ख़ुशी
में
फ़र्क़
न
महसूस
हो
जहाँ
मैं
दिल
को
उस
मक़ाम
पे
लाता
चला
गया
Sahir Ludhianvi
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दफ्न
ताबूत
में
कर
तिरी
हर
ख़ुशी
जश्न
कैसे
मनाते
है
मय्यत
पे
भी
ख़ास
तारीख़
थी
इम्तिहाँ
की
मगर
आज
बारात
उसकी
बुला
ली
गई
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Shilpi
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वो
बे-वफ़ा
है
तो
क्या
मत
कहो
बुरा
उसको
कि
जो
हुआ
सो
हुआ
ख़ुश
रखे
ख़ुदा
उसको
Naseer Turabi
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हल्की-हल्की
सी
हँसी,
साफ
इशारा
भी
नहीं
जान
भी
ले
गए
और,
जान
से
मारा
भी
नहीं
Sawan Shukla
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उदास
लोग
इसी
बात
से
हैं
ख़ुश
कि
चलो
हमारे
साथ
हुए
हादसों
की
बात
हुई
Abhishar Geeta Shukla
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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समुंदर
यूँँ
नहीं
खारा
हुआ
था
बिछड़
कर
आपसे
हारा
हुआ
था
कि
मुझ
में
हौसला
तो
था
बहुत
पर
मैं
बस
इस
वक़्त
का
मारा
हुआ
था
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anupam shah
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लफ़्ज़
फिर
ख़त
में
वो
बिन
लिखा
रह
गया
दिल
लिखा
हर
जगह
दिलरुबा
रह
गया
anupam shah
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बहुत
छोटा
सा
कुम्बा
था
बहुत
छोटा
फ़साना
था
ये
क़ौमों
के
दलालों
ने
मेरा
घर
फूँक
रक्खा
है
anupam shah
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खुले
लब
और
दो
आँखें
ज़रा
सी
अधखुली
सी
थीं
कि
ऐसे
हादसे
में
मैं
गुज़र
जाता
तो
अच्छा
था
anupam shah
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तुम्हें
मैं
बस
तुम्हारी
सम्त
रखकर
लौट
आऊँगा
मुझे
मालूम
है
जो
दर्द
है
रस्ता
भटकने
का
anupam shah
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