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anupam shah
khule lab aur do aañkhen zaraa si adhkhuli si theen
khule lab aur do aañkhen zaraa si adhkhuli si theen | खुले लब और दो आँखें ज़रा सी अधखुली सी थीं
- anupam shah
खुले
लब
और
दो
आँखें
ज़रा
सी
अधखुली
सी
थीं
कि
ऐसे
हादसे
में
मैं
गुज़र
जाता
तो
अच्छा
था
- anupam shah
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मैं
हर
शख़्स
के
चेहरे
को
बस
इस
उम्मीद
से
तकता
हूँ
शायद
से
मुझको
दो
आँखें
तेरे
जैसी
दिख
जाएँ
Siddharth Saaz
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उतर
गया
है
चेहरा
तेरे
जाने
से
लॉक
नहीं
खुलता
है
अब
मोबाइल
का
Tanoj Dadhich
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इक
गुल
के
मुरझाने
पर
क्या
गुलशन
में
कोहराम
मचा
इक
चेहरा
कुम्हला
जाने
से
कितने
दिल
नाशाद
हुए
Faiz Ahmad Faiz
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नज़र
में
रखना
कहीं
कोई
ग़म
शनास
गाहक
मुझे
सुख़न
बेचना
है
ख़र्चा
निकालना
है
Umair Najmi
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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लाखों
सद
में
ढेरों
ग़म
फिर
भी
नहीं
हैं
आँखें
नम
इक
मुद्दत
से
रोए
नहीं
क्या
पत्थर
के
हो
गए
हम
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Azm Shakri
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आज
है
उनको
आना,
मज़ा
आएगा
फिर
जलेगा
ज़माना,
मज़ा
आएगा
तीर
उनकी
नज़र
के
चलेंगे
कई
दिल
बनेगा
निशाना
मज़ा
आएगा
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Bhaskar Shukla
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तू
जो
हर
रोज़
नए
हुस्न
पे
मर
जाता
है
तू
बताएगा
मुझे
इश्क़
है
क्या
जाने
दे
Ali Zaryoun
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मुमकिन
है
कि
सदियों
भी
नज़र
आए
न
सूरज
इस
बार
अँधेरा
मिरे
अंदर
से
उठा
है
Aanis Moin
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ज़ख़्म
लगे
हैं
कितने
दिल
पर
याद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
शाद
नहीं
हूँ
मैं
तुमको
नाशाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
उम्र
गए
पे
तेरी
सूरत
और
मिरी
आँखें
टकराईं
उम्र
गए
में
सोची
वो
फ़रियाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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तुम्हें
सोचकर
के
मैं
यूँँ
खिल
रहा
हूँ
कि
करवट
बदल
कर
तुम्हें
मिल
रहा
हूँ
वो
जिस
पर
से
लौटे
हैं
सारे
मुसाफ़िर
मैं
ऐसे
ही
दरिया
का
साहिल
रहा
हूँ
बहुत
वक़्त
बीता
समझने
में
ये
भी
मैं
आसाँ
रहा
हूँ
या
मुश्किल
रहा
हूँ
मुझे
छोड़ने
का
गुमाँ
यूँँ
न
करना
न
जाने
मैं
कितनों
की
मंज़िल
रहा
हूँ
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anupam shah
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वही
मंज़र
मुझे
हर
बार
नज़र
आता
है
आँख
मूँदूँ
तो
मुझे
यार
नज़र
आता
है
ऐसे
तो
मौत
का
मेरी
कोई
क़ातिल
ही
नहीं
वैसे
हर
शख़्स
गुनहगार
नज़र
आता
है
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anupam shah
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दिल
ही
दिल
में
न
बातें
बनाया
करो
सामने
जब
हो
तो
कुछ
बताया
करो
अपनी
मस्ती
में
बस्ती
बसाया
करो
जो
जले
दिल
किसी
का
जलाया
करो
ख़ल्वतों
में
है
जीने
की
बस
ये
अदा
आइना
देखकर
मुस्कुराया
करो
बात
करने
का
है
बस
सलीक़ा
यही
एक
सुन
कर
के
दूजी
सुनाया
करो
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anupam shah
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तुम्हारे
वासते
जो
अब
नहीं
क़ाबिल
रहा
हूँ
मैं
उन्हें
पूछो
ज़रा
जिनके
लिए
मुश्किल
रहा
हूँ
मैं
भटकता
फिर
रहा
हूँ
बाद
तेरे
इस
तरह
से
मैं
कभी
दरया
कभी
कश्ती
कभी
साहिल
रहा
हूँ
मैं
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anupam shah
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है
मुझको
रश्क़
तेरी
पाँव
की
पायल
से
इतना
यूँँ
लिपट
कर
पाँव
से
तेरे
ये
इतना
नाचती
क्यूँँ
है
anupam shah
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