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Siraj Faisal Khan
tu apne ghar men muhabbat ki jeet par KHush hai
tu apne ghar men muhabbat ki jeet par KHush hai | तू अपने घर में मुहब्बत की जीत पर ख़ुश है
- Siraj Faisal Khan
तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
- Siraj Faisal Khan
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जब
भी
कोई
मंज़िल
हासिल
करता
हूँ
याद
बहुत
आती
हैं
तेरी
ता'रीफ़ें
Tanoj Dadhich
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पा
ए
उम्मीद
प
रक्खे
हुए
सर
हैं
हम
लोग
हैं
न
होने
के
बराबर
ही
मगर
हैं
हम
लोग
तू
ने
बरता
ही
नहीं
ठीक
से
हम
को
ऐ
दोस्त
ऐब
लगते
हैं
ब-ज़ाहिर
प
हुनर
हैं
हम
लोग
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Abhishek shukla
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल,
तो
जुस्तजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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किसी
से
छोटी
सी
एक
उम्मीद
बाँध
लीजिए
मोहब्बतों
का
अगर
जनाज़ा
निकालना
है
Shakeel Jamali
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झिझकता
हूँ
उसे
इल्ज़ाम
देते
कोई
उम्मीद
अब
भी
रोकती
है
Shariq Kaifi
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जँचने
लगा
है
दर्द
मुझे
आपका
दिया
बर्बाद
करने
वाले
ने
ही
आसरा
दिया
कल
पहली
बार
लड़ने
की
हिम्मत
नहीं
हुई
मुझको
किसी
के
प्यार
ने
बुजदिल
बना
दिया
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Kushal Dauneria
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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मैं
अकेला
ही
चला
था
जानिब-ए-मंज़िल
मगर
लोग
साथ
आते
गए
और
कारवाँ
बनता
गया
Majrooh Sultanpuri
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मुझे
दुश्मन
से
भी
ख़ुद्दारी
की
उम्मीद
रहती
है
किसी
का
भी
हो
सर
क़दमों
में
सर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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हासिल
न
कर
पाया
तुझे
मैं
मिन्नतों
के
बाद
भी
उम्मीद
सेंटा
से
लगाना
लाज़मी
भी
है
मिरा
Harsh saxena
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आज
मेरी
इक
ग़ज़ल
ने
उस
के
होंटों
को
छुआ
आज
पहली
बार
अपनी
शा'इरी
अच्छी
लगी
Siraj Faisal Khan
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मैं
संग-ए-मील
था
तो
ये
करना
पड़ा
मुझे
ता-उम्र
रास्ते
में
ठहरना
पड़ा
मुझे
Siraj Faisal Khan
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तिरे
एहसास
में
डूबा
हुआ
मैं
कभी
सहरा
कभी
दरिया
हुआ
मैं
तिरी
नज़रें
टिकी
थीं
आसमाँ
पर
तिरे
दामन
से
था
लिपटा
हुआ
मैं
खुली
आँखों
से
भी
सोया
हूँ
अक्सर
तुम्हारा
रास्ता
तकता
हुआ
मैं
ख़ुदा
जाने
के
दलदल
में
ग़मों
के
कहाँ
तक
जाऊँगा
धँसता
हुआ
मैं
बहुत
पुर-ख़ार
थी
राह-ए-मोहब्बत
चला
आया
मगर
हँसता
हुआ
मैं
कई
दिन
बाद
उस
ने
गुफ़्तुगू
की
कई
दिन
बा'द
फिर
अच्छा
हुआ
मैं
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Siraj Faisal Khan
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तुम्हारा
हाथ
मेरे
हाथ
से
न
छूटेगा
न
ख़ानदां
से
डरूँगा
न
मैं
ज़माने
से
Siraj Faisal Khan
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इश्क़
मेरी
ज़ुबान
से
निकला
और
मैं
ख़ानदान
से
निकला
Siraj Faisal Khan
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