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anupam shah
main arse baad itni kashmakash men phir se guzra hooñ
main arse baad itni kashmakash men phir se guzra hooñ | मैं अर्से बाद इतनी कश्मकश में फिर से गुज़रा हूँ
- anupam shah
मैं
अर्से
बाद
इतनी
कश्मकश
में
फिर
से
गुज़रा
हूँ
कि
तेरी
इन्तिज़ारी
है
औ
तन्हा
भी
बहुत
ख़ुश
हूँ
- anupam shah
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भोले
बन
कर
हाल
न
पूछ
बहते
हैं
अश्क
तो
बहने
दो
जिस
से
बढ़े
बेचैनी
दिल
की
ऐसी
तसल्ली
रहने
दो
Arzoo Lakhnavi
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मेरी
बेचैनी
का
आलम
मेरी
बेचैनी
से
पूछो
मेरे
चहरे
से
पूछोगे
कहेगा
ठीक
है
सब
कुछ
Aqib khan
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कोई
दीवाना
कहता
है
कोई
पागल
समझता
है
मगर
धरती
की
बेचैनी
को
बस
बादल
समझता
है
Kumar Vishwas
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तेरी
अंँगड़ाई
के
आलम
का
ख़याल
आया
जब
ज़ेहन-ए-वीरांँ
में
खनकने
लगे
कंगन
कितने
Shashank Shekhar Pathak
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शब-ए-इंतिज़ार
की
कश्मकश
में
न
पूछ
कैसे
सहर
हुई
कभी
इक
चराग़
जला
दिया
कभी
इक
चराग़
बुझा
दिया
Majrooh Sultanpuri
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पलक
का
बाल
गिरे
कब
मैं
कब
तुझे
माँगूँ
मैं
कशमकश
में
ये
पलकें
न
नोच
लूँ
अपनी
Vishnu virat
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जाने
कैसी
कश्मकश
है
क्या
करूँँ
जी
में
आता
है
कि
दुनिया
फूँक
दूँ
Ajeetendra Aazi Tamaam
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उस
की
बेचैनी
बढ़ाना
चाहती
हूँ
सुनिए
कह
कर
चुप
लगाना
चाहती
हूँ
Pooja Bhatia
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क्या
हुआ
वास्ते
किसके
तू
रो
गया
जो
तेरा
था
नहीं
वो
कहीं
खो
गया
इश्क़
उसका
ही
सच्चा
हुआ
है
यहाँ
प्यार
में
खो
गया
प्यार
ही
हो
गया
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anupam shah
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जाने
का
जो
ग़म
होता
है
तेज
कभी
मद्धम
होता
है
तुम
सेे
बिछड़कर
जाना
हमने
आँख
का
आँसू
नम
होता
है
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anupam shah
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अकेली
रात
में
आँखों
को
मेरी
एक
सपना
दे
बुरा
दे
ख़्वाब
मुझको
तू
मगर
तू
ख़्वाब
अपना
दे
anupam shah
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मैं
कहाँ
का
था
कहाँ
का
कर
गए
कितना
तुम
मेरा
मुनाफ़ा
कर
गए
ग़म
मिटाने
आए
थे
तुम
तो
मिरे
तुम
मिरे
ग़म
में
इज़ाफ़ा
कर
गए
पूछते
थे
साथ
दोगे
उम्र
भर
जो
मुझे
अब
बेसहारा
कर
गए
जो
दु'आ
थी
बद्दुआ
जैसी
लगी
आप
कैसा
इस्तिख़ारा
कर
गए
सामने
दरिया
था
और
प्यासा
था
मैं
और
वो
मुझ
सेे
किनारा
कर
गए
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anupam shah
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तुम्हारी
नज़र
का
सितारा
हुआ
मैं
कुछ
इस
तरह
से
तुम्हारा
हुआ
जो
पकड़ा
था
दामन
तुम्हारा
कभी
ख़ुदा
का
मुझे
कुछ
इशारा
हुआ
मिरे
हाथ
में
तेरा
चेहरा
सनम
वो
क़िस्सा
न
फिर
जो
दुबारा
हुआ
मुझे
इश्क़
का
फ़न
सिखाया
गया
मैं
तड़पा
बहुत
जब
किनारा
हुआ
यूँँ
फिरता
हूँ
अब
बेसबब
गुमशुदा
मुहब्बत
में
लूटा
सा
मारा
हुआ
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anupam shah
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