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Aqib khan
meri bechaini ka aalam meri bechaini se poochho
meri bechaini ka aalam meri bechaini se poochho | मेरी बेचैनी का आलम मेरी बेचैनी से पूछो
- Aqib khan
मेरी
बेचैनी
का
आलम
मेरी
बेचैनी
से
पूछो
मेरे
चहरे
से
पूछोगे
कहेगा
ठीक
है
सब
कुछ
- Aqib khan
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हर
एक
सम्त
यहाँ
वहशतों
का
मस्कन
है
जुनूँ
के
वास्ते
सहरा
ओ
आशियाना
क्या
Azhar Iqbal
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मेरी
अक्ल-ओ-होश
की
सब
हालतें
तुमने
साँचे
में
जुनूँ
के
ढाल
दी
कर
लिया
था
मैंने
अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुमने
फिर
बाँहें
गले
में
डाल
दी
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Jaun Elia
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एक
से
एक
जुनूँ
का
मारा
इस
बस्ती
में
रहता
है
एक
हमीं
हुशियार
थे
यारो
एक
हमीं
बद-नाम
हुए
Ibn E Insha
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उस
से
बढ़
कर
किया
मिलेगा
और
इनआम-ए-जुनूँ
अब
तो
वो
भी
कह
रहे
हैं
अपना
दीवाना
मुझे
Hafeez Banarasi
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ऐ
मिरी
ज़ात
के
सुकूँ
आ
जा
थम
न
जाए
कहीं
जुनूँ
आ
जा
इस
से
पहले
कि
मैं
अज़िय्यत
में
अपनी
आँखों
को
नोच
लूँ
आ
जा
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Fareeha Naqvi
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हम
को
जुनूँ
क्या
सिखलाते
हो
हम
थे
परेशाँ
तुम
से
ज़ियादा
चाक
किए
हैं
हम
ने
अज़ीज़ो
चार
गरेबाँ
तुम
से
ज़ियादा
Majrooh Sultanpuri
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कमी
न
की
तिरे
वहशी
ने
ख़ाक
उड़ाने
में
जुनूँ
का
नाम
उछलता
रहा
ज़माने
में
Firaq Gorakhpuri
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मुझ
से
कहा
जिब्रील-ए-जुनूँ
ने
ये
भी
वही-ए-इलाही
है
मज़हब
तो
बस
मज़हब-ए-दिल
है
बाक़ी
सब
गुमराही
है
Majrooh Sultanpuri
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कुछ
न
मैं
समझा
जुनून
ओ
इश्क़
में
देर
नासेह
मुझ
को
समझाता
रहा
Meer Taqi Meer
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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कम-अज़-कम
दिल
सही
से
तोड़
जाना
ज़रा
अच्छा
तो
हो
दुखड़ा
हमारा
Aqib khan
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ओढ़
कर
मसरूफि़यत
आ
तो
गए
हैं
देखना
है
ज़िन्दगी
रोकेगी
कब
तक
Aqib khan
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जीतने
पर
भी
मात
बनती
है
ऐ
ख़ुदा
अब
नजात
बनती
है
बात
करना
बहुत
ज़रूरी
है
बात
करने
से
बात
बनती
है
पहले
महबूब
बनते
हैं
साहब
और
फिर
काइनात
बनती
है
इश्क़
में
लुट
गए,
हाँ
ठीक
हुआ
इश्क़
में
वारदात
बनती
है
तेरी
तस्वीर
बन
तो
जाती
है
पर
बहुत
वाहियात
बनती
है
वो
भी
लौटेगा
देख
लेना
तुम
बाद
दिन
के
ही
रात
बनती
है
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Aqib khan
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सच
कहूँ
सच
सराब
जैसा
है
तेरा
दिखना
भी
ख़्वाब
जैसा
है
आज
के
दौर
का
न
समझें
मुझे
दिल
पुरानी
किताब
जैसा
है
कर
रहे
हो
तो
ठीक
से
कर
लो
क्या
ये
पर्दा
नक़ाब
जैसा
है
वो
हसीं
है
है
ये
तो
सच
लेकिन
उसका
मिलना
अज़ाब
जैसा
है
आग
से
खेलता
है
वो
'आक़िब'
और
तू
है
कि
आब
जैसा
है
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Aqib khan
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होश
भी
था
सुकून
में
थे
हम
हाल
बदतर
नहीं
थे
यारों
तब
वो
भी
माहिर
था
बे-वफ़ाई
में
हम
भी
कमतर
नहीं
थे
यारों
तब
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Aqib khan
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