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anupam shah
dikhaaya hausla is baar kar ke
dikhaaya hausla is baar kar ke | दिखाया हौसला इस बार कर के
- anupam shah
दिखाया
हौसला
इस
बार
कर
के
मोहब्बत
को
सरेबाज़ार
कर
के
हमारे
यार
छूटे
फिर
गए
तुम
अकेले
हो
गए
हैं
प्यार
कर
के
वो
ग़ुस्सा
कर
के
जाता
था
हमेशा
गया
है
इस
दफ़ा
वो
प्यार
कर
के
ख़रीदी
और
बेची
भावनाएं
इन्ही
रिश्तों
को
क्यूँँं
बाज़ार
करके
ये
इकतरफा
मोहब्बत
अब
न
होगी
अरे
हम
थक
गए
बेगार
कर
के
- anupam shah
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या
वो
थे
ख़फ़ा
हम
से
या
हम
हैं
ख़फ़ा
उन
से
कल
उन
का
ज़माना
था
आज
अपना
ज़माना
है
Jigar Moradabadi
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मैं
एक
किरदार
से
बड़ा
तंग
हूँ
क़लमकार
मुझे
कहानी
में
डाल
ग़ुस्सा
निकालना
है
Umair Najmi
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ग़ुस्से
में
भींच
लेता
है
बाँहों
में
अपनी
वो
क्या
सोचना
है
फिर
उसे
ग़ुस्सा
दिलाइए
Pooja Bhatia
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लोग
कहते
हैं
कि
तू
अब
भी
ख़फ़ा
है
मुझ
से
तेरी
आँखों
ने
तो
कुछ
और
कहा
है
मुझ
से
Jaan Nisar Akhtar
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तुम
मुहब्बत
से
नहीं
मुझ
सेे
ख़फ़ा
हो
शायद
तुम
अगर
चाहो
तो
पिंजरा
भी
बदल
सकते
हो
मुंतज़िर
हूँ
मैं
सो
नंबर
भी
नहीं
बदलूँगा
और
तुम
शहर
का
नक़्शा
भी
बदल
सकते
हो
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Vikram Sharma
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चेहरा
धुँदला
सा
था
और
सुनहरे
झुमके
थे
बादल
ने
कानों
में
चाँद
के
टुकड़े
पहने
थे
इक
दूजे
को
खोने
से
हम
इतना
डरते
थे
ग़ुस्सा
भी
होते
तो
बातें
करते
रहते
थे
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Vikram Gaur Vairagi
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तुम
को
आता
है
प्यार
पर
ग़ुस्सा
मुझ
को
ग़ुस्से
पे
प्यार
आता
है
Ameer Minai
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जो
ग़ुस्सा
आ
गया
तो
क्या
ही
कर
लेंगे
ज़ुबाँ
ये
मेरी
गाली
भी
नहीं
देती
Irshad Siddique "Shibu"
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दो
दफ़ा
ग़ुस्सा
हुए
वो
एक
ग़लती
पर
मेरी
रात
की
रोटी
सवेरे
काम
में
लाई
गई
Tanoj Dadhich
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अभी
से
मेरे
रफ़ूगर
के
हाथ
थकने
लगे
अभी
तो
चाक
मिरे
ज़ख़्म
के
सिले
भी
नहीं
ख़फ़ा
अगरचे
हमेशा
हुए
मगर
अब
के
वो
बरहमी
है
कि
हम
से
उन्हें
गिले
भी
नहीं
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Parveen Shakir
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बड़े
बूढों
के
घर
को
अब
जो
बच्चे
छोड़
देते
हैं
समुंदर
साहिलों
तक
आ
के
रस्ता
मोड़
देते
हैं
वसीयत
में
कोई
भी
दस्तख़त
जाली
नहीं
होता
ये
पूरे
होश
में
अपने
ही
घर
को
तोड़
देते
हैं
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anupam shah
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करे
क्या
इश्क़
मस्ताना
ये
अब्र-ए-आ
समाँ
तुम
सेे
असीरी
चश्म-ए-दीदावर
की
ये
कैसे
निभाएगा
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anupam shah
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मोहब्बत
में
इज़ाफ़ा
हो
रहा
है
मगर
ख़र्चा
ज़ियादा
हो
रहा
है
anupam shah
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कुछ
तिश्नगी
भी
ऐसे
मिटती
नहीं
हमारी
हक़
में
नहीं
समुंदर
के
प्यास
को
बुझाना
anupam shah
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तू
ही
हर
ज़ख़्म
देता
है
तू
ही
मरहम
लगाता
है
बड़ा
बेदिल
ख़ुदा
है
तू
ख़ुदा
होना
जताता
है
ये
वादे
प्यार
के
फूलों
से
नाज़ुक
क्यूँ
बनाता
है
वफ़ा
की
राह
में
कांटे
ही
कांटे
क्यूँ
बिछाता
है
ज़बाँ
ने
तो
तेरी
इक
उम्र
मुझ
सेे
झूठ
बोला
है
मुझे
तो
बस
गिला
तेरी
निगाहों
का
सताता
है
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anupam shah
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