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Ammar Iqbal
raat se jang koi khel naiiñ
raat se jang koi khel naiiñ | रात से जंग कोई खेल नईं
- Ammar Iqbal
रात
से
जंग
कोई
खेल
नईं
तुम
चराग़ों
में
इतना
तेल
नईं
आ
गया
हूँ
तो
खींच
अपनी
तरफ़
मेरी
जानिब
मुझे
धकेल
नईं
जब
मैं
चाहूँगा
छोड़
जाऊँगा
इक
सराए
है
जिस्म
जेल
नईं
बेंच
देखी
है
ख़्वाब
में
ख़ाली
और
पटरी
पर
उस
पे
रेल
नईं
जिस
को
देखा
था
कल
दरख़्त
के
गिर्द
वो
हरा
अज़दहा
था
बेल
नईं
- Ammar Iqbal
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यहीं
तक
इस
शिकायत
को
न
समझो
ख़ुदा
तक
जाएगा
झगड़ा
हमारा
Shariq Kaifi
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जीत
भी
लूँ
गर
लड़ाई
तुम
से
मैं
तो
क्या
मिलेगा
हाथ
में
दोनों
के
बस
इक
टूटा
सा
रिश्ता
मिलेगा
कर
के
लाखों
कोशिशें
गर
जो
बचा
भी
लूँ
मैं
रिश्ता
तो
नहीं
फिर
मन
हमारा
पहले
के
जैसा
मिलेगा
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Ankit Maurya
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देश
मेरा
जंग
तो
जीता
मगर
लौट
कर
आया
नहीं
बेटा
मेरा
Divy Kamaldhwaj
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नया
इक
रिश्ता
पैदा
क्यूँँ
करें
हम
?
बिछड़ना
है
तो
झगड़ा
क्यूँँ
करें
हम?
Jaun Elia
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मुझ
सेे
जो
मुस्कुरा
के
मिला
हो
गया
उदास
ताज़ा
हवा
की
खिड़कियों
को
जंग
लग
गई
Siddharth Saaz
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उस
की
ख़्वाहिश
पे
तुम
को
भरोसा
भी
है
उस
के
होने
न
होने
का
झगड़ा
भी
है
लुत्फ़
आया
तुम्हें
गुमरही
ने
कहा
गुमरही
के
लिए
एक
ताज़ा
ग़ज़ल
Irfan Sattar
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बंद
कमरा,
सर
पे
पंखा,
तीरगी
है
और
मैं
एक
लड़ाई
चल
रही
है
ज़िंदगी
है
औऱ
मैं
Shadab Asghar
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वो
जंग
जिस
में
मुक़ाबिल
रहे
ज़मीर
मिरा
मुझे
वो
जीत
भी
'अंबर'
न
होगी
हार
से
कम
Ambreen Haseeb Ambar
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बद-हवा
सेी
है
बे-ख़याली
है
क्या
ये
हालत
भी
कोई
हालत
है
ज़िंदगी
से
है
जंग
शाम-ओ-सहर
मौत
से
शिकवा
है
शिकायत
है
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Chandan Sharma
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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मैंने
चाहा
था
ज़ख़्म
भर
जाएँ
ज़ख़्म
ही
ज़ख़्म
भर
गए
मुझ
में
Ammar Iqbal
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अक्स
कितने
उतर
गए
मुझ
में
फिर
न
जाने
किधर
गए
मुझ
में
मैं
ने
चाहा
था
ज़ख़्म
भर
जाएँ
ज़ख़्म
ही
ज़ख़्म
भर
गए
मुझ
में
मैं
वो
पल
था
जो
खा
गया
सदियाँ
सब
ज़माने
गुज़र
गए
मुझ
में
ये
जो
मैं
हूँ
ज़रा
सा
बाक़ी
हूँ
वो
जो
तुम
थे
वो
मर
गए
मुझ
में
मेरे
अंदर
थी
ऐसी
तारीकी
आ
के
आसेब
डर
गए
मुझ
में
पहले
उतरा
मैं
दिल
के
दरिया
में
फिर
समुंदर
उतर
गए
मुझ
में
कैसा
मुझ
को
बना
दिया
'अम्मार'
कौन
सा
रंग
भर
गए
मुझ
में
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Ammar Iqbal
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ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
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Ammar Iqbal
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यूँँही
बे-बाल-ओ-पर
खड़े
हुए
हैं
हम
क़फ़स
तोड़
कर
खड़े
हुए
हैं
दश्त
गुज़रा
है
मेरे
कमरे
से
और
दीवार-ओ-दर
खड़े
हुए
हैं
ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
और
कितनी
घुमाओगे
दुनिया
हम
तो
सर
थाम
कर
खड़े
हुए
हैं
बरगुज़ीदा
बुज़ुर्ग
नीम
के
पेड़
थक
गए
हैं
मगर
खड़े
हुए
हैं
मुद्दतों
से
हज़ार-हा
आलम
एक
उम्मीद
पर
खड़े
हुए
हैं
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Ammar Iqbal
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ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
Ammar Iqbal
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