aks kitne utar ga.e mujh men | अक्स कितने उतर गए मुझ में

  - Ammar Iqbal
अक्सकितनेउतरगएमुझमें
फिरजानेकिधरगएमुझमें
मैंनेचाहाथाज़ख़्मभरजाएँ
ज़ख़्महीज़ख़्मभरगएमुझमें
मैंवोपलथाजोखागयासदियाँ
सबज़मानेगुज़रगएमुझमें
येजोमैंहूँज़रासाबाक़ीहूँ
वोजोतुमथेवोमरगएमुझमें
मेरेअंदरथीऐसीतारीकी
केआसेबडरगएमुझमें
पहलेउतरामैंदिलकेदरियामें
फिरसमुंदरउतरगएमुझमें
कैसामुझकोबनादिया'अम्मार'
कौनसारंगभरगएमुझमें
  - Ammar Iqbal
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