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Ammar Iqbal
dil aaj shaam se hi use dhoondhne laga
dil aaj shaam se hi use dhoondhne laga | दिल आज शाम से ही उसे ढूँडने लगा
- Ammar Iqbal
दिल
आज
शाम
से
ही
उसे
ढूँडने
लगा
कल
जिस
के
बा'द
कमरे
में
तन्हाई
आई
थी
- Ammar Iqbal
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चालीस
साल
इस
को
अकेले
निभाएँगे
ये
चार
साल
का
जो
तअल्लुक़
था
दरमियाँ
Afzal Ali Afzal
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नाप
रहा
था
एक
उदासी
की
गहराई
हाथ
पकड़कर
वापस
लायी
है
तन्हाई
वस्ल
दिनों
को
काफ़ी
छोटा
कर
देता
है
हिज्र
बढ़ा
देता
है
रातों
की
लम्बाई
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Tanoj Dadhich
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बड़ी
मुश्किल
से
नीचे
बैठते
हैं
जो
तेरे
साथ
उठते-बैठते
हैं
अकेले
बैठना
होगा
किसी
को
अगर
हम
तुम
इकट्ठे
बैठते
हैं
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Khurram Afaq
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एक
अरसे
तक
अकेले
हम
चले
फिर
हमारा
नाम
चलने
लग
गया
Tanoj Dadhich
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मैं
अपने
चारों
तरफ़
हूँ
और
इस
तरह
का
हुजूम
अजीब
किस्म
की
तन्हाई
साथ
लाता
है
Abhishek shukla
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पता
करो
कि
मेरे
साथ
कौन
उतरा
था
ज़मीं
पे
कोई
अकेला
नहीं
उतरता
है
Ahmad Abdullah
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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मैं
तो
ग़ज़ल
सुना
के
अकेला
खड़ा
रहा
सब
अपने
अपने
चाहने
वालों
में
खो
गए
Krishna Bihari Noor
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तमाम
नाख़ुदा
साहिल
से
दूर
हो
जाएँ
समुंदरों
से
अकेले
में
बात
करनी
है
Tehzeeb Hafi
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तख़य्युल
को
बरी
करने
लगा
हूँ
मैं
ज़ेहनी
ख़ुद-कुशी
करने
लगा
हूँ
मुझे
ज़िंदा
जलाया
जा
रहा
है
तो
क्या
मैं
रौशनी
करने
लगा
हूँ
मैं
आईनों
को
देखे
जा
रहा
था
अब
इन
से
बात
भी
करने
लगा
हूँ
तुम्हारी
बस
तुम्हारी
दुश्मनी
में
मैं
सब
से
दोस्ती
करने
लगा
हूँ
मुझे
गुमराह
करना
ग़ैर-मुमकिन
मैं
अपनी
पैरवी
करने
लगा
हूँ
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Ammar Iqbal
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एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
Ammar Iqbal
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मैं
आईनों
को
देखे
जा
रहा
था
अब
इन
से
बात
भी
करने
लगा
हूँ
Ammar Iqbal
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ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
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Ammar Iqbal
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ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
Ammar Iqbal
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