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Ammar Iqbal
khud-parasti se ishq ho gaya hai
khud-parasti se ishq ho gaya hai | ख़ुद-परस्ती से इश्क़ हो गया है
- Ammar Iqbal
ख़ुद-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
अपनी
हस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
जब
से
देखा
है
इस
फ़क़ीरनी
को
फ़ाक़ा-मस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ख़ुद
तराशा
है
जब
से
बुत
अपना
बुत-परस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
ये
फ़लक-ज़ाद
की
कहानी
है
इस
को
पस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
- Ammar Iqbal
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इश्क़
में
कहते
हो
हैरान
हुए
जाते
हैं
ये
नहीं
कहते
कि
इंसान
हुए
जाते
हैं
Josh Malihabadi
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तेरे
बग़ैर
ख़ुदा
की
क़सम
सुकून
नहीं
सफ़ेद
बाल
हुए
हैं
हमारा
ख़ून
नहीं
न
हम
ही
लौंडे
लपाड़ी
न
कच्ची
उम्र
का
वो
ये
सोचा
समझा
हुआ
इश्क़
है
जुनून
नहीं
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Shamim Abbas
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इश्क़
में
ख़ुद-कुशी
नहीं
करते
इश्क़
में
इंतिज़ार
करते
हैं
Rajesh Reddy
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अक्सर
ही
ज़ख़्म
इश्क़
में
पाले
हैं
औरतें
पर
कितने
टूटे
मर्द
सँभाले
हैं
औरतें
Abhishar Geeta Shukla
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इश्क़
को
छोड़
सब
चुन
लिया
उसने
फिर
रख
दिया
फल
को
फिर
टोकरी
से
अलग
Neeraj Neer
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पहला
इश्क़
सफल
हो
जाए
यार
कहाँ
ये
मुमकिन
है
पहली
रोटी
गोल
बने
ये
तो
लगभग
नामुमकिन
है
Rituraj kumar
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अपने
इश्क़
का
यूँँ
इज़हार
करना
है
तुझ
सेे
तुझको
हाथों
से
पहनाएँगें
कानों
में
झुमके
Harsh saxena
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कहाँ
हम
ग़ज़ल
का
हुनर
जानते
हैं
मगर
इस
ज़बाँ
का
असर
जानते
हैं
ये
वो
हुस्न
जिसको
निखारा
गया
है
नया
कुछ
नहीं
हम
ख़बर
जानते
हैं
कि
है
जो
क़फ़स
में
वो
पंछी
रिहा
हो
परिंदें
ज़मीं
के
शजर
जानते
हैं
फ़क़त
रूह
के
नाम
है
इश्क़
लेकिन
बदन
के
हवाले
से
घर
जानते
हैं
फ़ुलाँ
है
फ़ुलाँ
का
यक़ीं
हैं
हमें
भी
सुनो
हम
उसे
सर-ब-सर
जानते
हैं
कि
अब
यूँँ
सिखाओ
न
रस्म-ए-सियासत
झुकाना
कहाँ
है
ये
सर
जानते
हैं
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Neeraj Neer
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यूँँ
कहें
नुमाइशों
के
दिन
क़रीब
आ
गए
महज़
फ़रवरी
हो
किस
तरह
महीना
इश्क़
का
Neeraj Neer
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ये
इश्क़
आग
है
और
वो
बदन
शरारा
है
ये
सर्द
बर्फ़
सा
लड़का
पिघलने
वाला
है
Shadab Asghar
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मैंने
चाहा
था
ज़ख़्म
भर
जाएँ
ज़ख़्म
ही
ज़ख़्म
भर
गए
मुझ
में
Ammar Iqbal
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रात
से
जंग
कोई
खेल
नईं
तुम
चराग़ों
में
इतना
तेल
नईं
आ
गया
हूँ
तो
खींच
अपनी
तरफ़
मेरी
जानिब
मुझे
धकेल
नईं
जब
मैं
चाहूँगा
छोड़
जाऊँगा
इक
सराए
है
जिस्म
जेल
नईं
बेंच
देखी
है
ख़्वाब
में
ख़ाली
और
पटरी
पर
उस
पे
रेल
नईं
जिस
को
देखा
था
कल
दरख़्त
के
गिर्द
वो
हरा
अज़दहा
था
बेल
नईं
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Ammar Iqbal
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दिल
आज
शाम
से
ही
उसे
ढूँडने
लगा
कल
जिस
के
बा'द
कमरे
में
तन्हाई
आई
थी
Ammar Iqbal
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नज़र
से
तुम
को
मिले
न
कोई
सुराग़
दिल
का
झुका
के
गर्दन
बुझा
लिया
है
चराग़
दिल
का
सुनूँ
न
कैसे
करूँँ
न
क्यूँँकर
मैं
अपने
दिल
की
मेरे
अलावा
है
कौन
इस
बद-दिमाग़
दिल
का
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Ammar Iqbal
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ज़रा
सी
देर
जले
जल
के
राख
हो
जाए
वो
रौशनी
दे
भले
जल
के
राख
हो
जाए
वो
आफ़्ताब
जिसे
सब
सलाम
करते
हैं
जो
वक़्त
पर
न
ढले
जल
के
राख
हो
जाए
मैं
दूर
जा
के
कहीं
बाँसुरी
बजाऊँगा
बला
से
रोम
जले
जल
के
राख
हो
जाए
वो
एक
लम्स-ए-गुरेज़ाँ
है
आतिश-ए-बे-सोज़
मुझे
लगाए
गले
जल
के
राख
हो
जाए
कोई
चराग़
बचे
सुब्ह
तक
तो
तारीकी
उसी
चराग़-तले
जल
के
राख
हो
जाए
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Ammar Iqbal
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