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Ammar Iqbal
nazar se tum ko mile na koii suraagh dil ka
nazar se tum ko mile na koii suraagh dil ka | नज़र से तुम को मिले न कोई सुराग़ दिल का
- Ammar Iqbal
नज़र
से
तुम
को
मिले
न
कोई
सुराग़
दिल
का
झुका
के
गर्दन
बुझा
लिया
है
चराग़
दिल
का
सुनूँ
न
कैसे
करूँँ
न
क्यूँँकर
मैं
अपने
दिल
की
मेरे
अलावा
है
कौन
इस
बद-दिमाग़
दिल
का
- Ammar Iqbal
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एक
दरवेश
को
तिरी
ख़ातिर
सारी
बस्ती
से
इश्क़
हो
गया
है
Ammar Iqbal
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मैंने
तस्वीर
फेंक
दी
है
मगर
कील
दीवार
में
गड़ी
हुई
है
Ammar Iqbal
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बात
मैं
सरसरी
नहीं
करता
और
वज़ाहत
कभी
नहीं
करता
एक
ही
बात
मुझ
में
अच्छी
है
और
मैं
बस
वही
नहीं
करता
मुझको
कैसे
मिले
भला
फुर्सत
मैं
कोई
काम
ही
नहीं
करता
आप
ही
लोग
मार
देते
हैं
कोई
भी
ख़ुद-कुशी
नहीं
करता
एक
जुगनू
है
तेरी
यादों
का
जो
कभी
रौशनी
नहीं
करता
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Ammar Iqbal
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यूँँही
बे-बाल-ओ-पर
खड़े
हुए
हैं
हम
क़फ़स
तोड़
कर
खड़े
हुए
हैं
दश्त
गुज़रा
है
मेरे
कमरे
से
और
दीवार-ओ-दर
खड़े
हुए
हैं
ख़ुद
ही
जाने
लगे
थे
और
ख़ुद
ही
रास्ता
रोक
कर
खड़े
हुए
हैं
और
कितनी
घुमाओगे
दुनिया
हम
तो
सर
थाम
कर
खड़े
हुए
हैं
बरगुज़ीदा
बुज़ुर्ग
नीम
के
पेड़
थक
गए
हैं
मगर
खड़े
हुए
हैं
मुद्दतों
से
हज़ार-हा
आलम
एक
उम्मीद
पर
खड़े
हुए
हैं
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Ammar Iqbal
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जाओ
मातम
गुज़ारो
जाने
दो
जिस
का
ग़म
है
उसे
मनाने
दो
बीच
से
एक
दास्ताँ
टूटी
और
फिर
बन
गए
फ़साने
दो
हम
फ़क़ीरों
को
कुछ
तो
दो
साहब
कुछ
नहीं
दे
सको
तो
ता'ने
दो
हाथ
जिस
को
लगा
नहीं
सकता
उस
को
आवाज़
तो
लगाने
दो
तुम
दिया
हो
तो
उन
पतंगों
को
कम
से
कम
रौशनी
में
आने
दो
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Ammar Iqbal
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