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Siddharth Saaz
mujhse jo muskuraa ke mila ho gaya udaas
mujhse jo muskuraa ke mila ho gaya udaas | मुझ सेे जो मुस्कुरा के मिला हो गया उदास
- Siddharth Saaz
मुझ
सेे
जो
मुस्कुरा
के
मिला
हो
गया
उदास
ताज़ा
हवा
की
खिड़कियों
को
जंग
लग
गई
- Siddharth Saaz
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तू
भी
कब
मेरे
मुताबिक
मुझे
दुख
दे
पाया
किस
ने
भरना
था
ये
पैमाना
अगर
ख़ाली
था
एक
दुख
ये
कि
तू
मिलने
नहीं
आया
मुझ
सेे
एक
दुख
ये
है
उस
दिन
मेरा
घर
ख़ाली
था
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Tehzeeb Hafi
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तू
तो
वाक़िफ़
है
रिवाज़-ए-ग़म
से
इसके
इश्क़
तो
तेरा
भी
ये
पहला
नहीं
है
Siddharth Saaz
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ये
तुम
सब
मिल
के
जो
कुछ
कह
रहे
हो
मैं
कह
सकता
हूँ
पर
कहना
नहीं
है
हमारा
शे'र
भी
सुनने
न
आएँ
हमारा
दुख
जिन्हें
सहना
नहीं
है
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Ali Zaryoun
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जीना
मुश्किल
है
के
आसान,
ज़रा
देख
तो
लो
लोग
लगते
हैं
परेशान,
ज़रा
देख
तो
लो
इन
चराग़ों
के
तले
ऐसे
अँधेरे
क्यूँँ
हैं?
तुम
भी
रह
जाओगे
हैरान,
ज़रा
देख
तो
लो
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Javed Akhtar
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दुनिया
की
फ़िक्र
छोड़,
न
यूँँ
अब
उदास
बैठ
ये
वक़्त
रब
की
देन
है,
अम्मी
के
पास
बैठ
Salman Zafar
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ये
किस
मक़ाम
पे
लाई
है
ज़िंदगी
हम
को
हँसी
लबों
पे
है
सीने
में
ग़म
का
दफ़्तर
है
Hafeez Banarasi
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बारे
दुनिया
में
रहो
ग़म-ज़दा
या
शाद
रहो
ऐसा
कुछ
कर
के
चलो
याँ
कि
बहुत
याद
रहो
Meer Taqi Meer
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वो
जिसकी
याद
ने
जीना
मुहाल
कर
रखा
है
उसी
की
आस
ने
मुझको
सँभाल
कर
रखा
है
सियाह
रातों
में
साए
से
बातें
करता
है
तुम्हारे
ग़म
ने
नया
रोग
पाल
कर
रखा
है
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Harsh saxena
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अपनी
हालत
का
ख़ुद
एहसास
नहीं
है
मुझ
को
मैं
ने
औरों
से
सुना
है
कि
परेशान
हूँ
मैं
Aasi Uldani
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मैं
ज़िंदगी
के
सभी
ग़म
भुलाए
बैठा
हूँ
तुम्हारे
इश्क़
से
कितनी
मुझे
सहूलत
है
Zeeshan Sahil
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दो
आँखें
हैं
दो
पलकें
हैं
जबीं
है
चूमने
ख़ातिर
बहुत
से
ज़ाविए
हैं
उस
बदन
में
देखने
लायक
Siddharth Saaz
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जब
से
तूने
ये
बोला
था
"बदन
का
क्या
है
मिट्टी
है"
तब
से
तेरी
पीठ
पे
मुझको
हरसिंगार
उगाने
थे
Siddharth Saaz
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ये
ग़म
हमको
पत्थर
कर
देगा
इक
दिन
कोई
आ
कर
हमें
रुलाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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ये
जानते
हैं
ठीक
नहीं
माँग
रहे
हैं
हम
एक
खंडहर
को
मकीं
माँग
रहे
हैं
सब
माँग
रहे
हैं
ख़ुदास
तेरा
जिस्म
और
हम
हैं,
कि
फ़क़त
तेरी
जबीं
माँग
रहे
हैं
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Siddharth Saaz
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चाँद,
सूरज
और
बादल
देखकर
हँस
रहा
था
एक
पागल
देखकर
मैं
समझता
हूँ
जुनून-ए-इश्क़
भी
दौड़
पड़ता
हूँ
मैं
जंगल
देखकर
वो
शिकारी
पहले
इंसाँ
था
तभी
रो
दिया
था
मुझको
घाइल
देखकर
वो
उठाएगा
नज़र
तो
कोई
भी
डूब
जाएगा
वो
दलदल
देखकर
लम्स
तक
उसके
बदन
का
याद
है
उसकी
याद
आती
है
मख़मल
देखकर
हीरे
तक
के
भाव
कम
होने
लगे
उसकी
वो
चाँदी
की
पायल
देखकर
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Siddharth Saaz
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