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Amit Kumar
yaar jab tu hi itnaa pyaara hai
yaar jab tu hi itnaa pyaara hai | यार जब तू ही इतना प्यारा है
- Amit Kumar
यार
जब
तू
ही
इतना
प्यारा
है
औरो
का
कितने
में
गुज़ारा
है
ज़िंदगी
जो
जी
है
बिना
तेरे
लगता
है
अब
कोई
ख़सारा
है
इतना
तू
है
अज़ीज़
मुझको
की
जितना
बच्चा
माँ
को
दुलारा
है
उसके
झुमके
की
वो
चमक
देखो
भोर
का
जैसे
कोई
तारा
है
- Amit Kumar
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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उम्र
भर
मिलने
नहीं
देती
हैं
अब
तो
रंजिशें
वक़्त
हम
से
रूठ
जाने
की
अदा
तक
ले
गया
Fasih Akmal
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हुस्न
बख़्शा
जो
ख़ुदा
ने
आप
बख़्शें
दीद
अपनी
आरज़ू–ए–चश्म
पूरी
हो
मुकम्मल
ईद
अपनी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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तुझे
कौन
जानता
था
मेरी
दोस्ती
से
पहले
तेरा
हुस्न
कुछ
नहीं
था
मेरी
शा'इरी
से
पहले
Kaif Bhopali
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वफ़ा
का
ज़ोर
अगर
बाज़ुओं
में
आ
जाए
चराग़
उड़ता
हुआ
जुगनुओं
में
आ
जाए
खिराजे
इश्क़,
कहीं
जा
के
तब
अदा
होगा
हमारा
ख़ून
अगर
आँसुओं
में
आ
जाए
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Hashim Raza Jalalpuri
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बोसा
जो
तलब
मैं
ने
किया
हँस
के
वो
बोले
ये
हुस्न
की
दौलत
है
लुटाई
नहीं
जाती
Unknown
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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हुस्न
कुछ
और
नहीं
छत
की
हरी
काई
है
वक़्त-बे-वक़्त
जहाँ
पाँव
फिसल
जाता
है
Ashu Mishra
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इस
ज़माने
को
ज़माने
की
अदा
आती
है
और
इक
हम
है
हमें
सिर्फ़
वफ़ा
आती
है
Zubair Ali Tabish
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हुस्न
जब
मेहरबाँ
हो
तो
क्या
कीजिए
इश्क़
के
मग़्फ़िरत
की
दु'आ
कीजिए
Khumar Barabankvi
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खटती
है
दिन
भर
एक
रोटी
के
लिए
माँ
और
क्या
ही
करती
बच्ची
के
लिए
आख़िर
में
हम
को
भी
बिछड़ना
ही
पड़ा
उन
थोड़े
से
लोगों
की
बस्ती
के
लिए
जब
देखा
मैंने
सूखते
पेड़ों
को
कुछ
उन
में
लगा
दी
आग
पानी
के
लिए
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Amit Kumar
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कुछ
इसलिए
उस
में
मिरा
मन
लगता
है
वो
ऐसा
क़ातिल
है
जो
सज्जन
लगता
है
दीवारें
आ
जाती
हैं
भाई
भाई
में
अब
थोड़ी
घर
का
घर
से
आँगन
लगता
है
नाख़ून
इतने
प्यारे
हैं
उसके
कि
वो
जो
घाव
भी
कर
दे
तो
चंदन
लगता
है
जितना
जले
मज़बूत
उतना
होगा
ये
जीवन
किसी
मिट्टी
का
बर्तन
लगता
है
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Amit Kumar
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मेरे
अंदर
जब
तलक
ये
दिल
नहीं
था
भूलना
मेरे
लिए
मुुश्किल
नहीं
था
उसको
महबूबास
ज़्यादा
चाहा
मैंने
दोस्ती
भर
के
भी
जो
क़ाबिल
नहीं
था
उम्र
भर
आते
रहे
हैं
ख़्वाब
उसके
ज़िंदगी
में
जो
मुझे
हासिल
नहीं
था
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Amit Kumar
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ज़ेहन
में
अब
जैसे
बच्चे
आ
गए
हैं
हम
यहाँ
तक
हँसते
हँसते
आ
गए
हैं
तब
से
इतनी
बार
देखी
तेरी
फोटो
आँखों
के
अब
नीचे
गड्ढे
आ
गए
हैं
इक
भी
रस्ता
सच
नहीं
है
ज़िंदगी
का
देखो
कितने
लोग
चल
के
आ
गए
हैं
इक
तो
पहले
ही
वो
इतनी
ख़ूब-सूरत
और
फिर
आँखों
पे
चश्में
आ
गए
हैं
ज़िंदगी
ने
मारी
तब
तब
हम
को
ठोकर
जब
लगा
गिरते
सँभलते
आ
गए
हैं
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Amit Kumar
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ये
निशानी
रख
लो
अपनी
पास
अपने
क्या
करूँँगा
अब
मैं
इक
पुर्ज़ा
बचाकर
Amit Kumar
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