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Amit Kumar
mere andar jab talak ye dil nahin tha
mere andar jab talak ye dil nahin tha | मेरे अंदर जब तलक ये दिल नहीं था
- Amit Kumar
मेरे
अंदर
जब
तलक
ये
दिल
नहीं
था
भूलना
मेरे
लिए
मुुश्किल
नहीं
था
उसको
महबूबास
ज़्यादा
चाहा
मैंने
दोस्ती
भर
के
भी
जो
क़ाबिल
नहीं
था
उम्र
भर
आते
रहे
हैं
ख़्वाब
उसके
ज़िंदगी
में
जो
मुझे
हासिल
नहीं
था
- Amit Kumar
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जो
दोस्त
हैं
वो
माँगते
हैं
सुलह
की
दु'आ
दुश्मन
ये
चाहते
हैं
कि
आपस
में
जंग
हो
Lala Madhav Ram Jauhar
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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सखी
को
हमारी
नज़र
लग
न
जाए
उसे
ख़्वाब
में
रात
भर
देखते
हैं
Sahil Verma
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कुछ
तो
कर
आदाब-ए-महफ़िल
का
लिहाज़
यार
ये
पहलू
बदलना
छोड़
दे
Waseem Barelvi
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दुश्मनी
कर
मगर
उसूल
के
साथ
मुझ
पर
इतनी
सी
मेहरबानी
हो
मेरे
में'यार
का
तक़ाज़ा
है
मेरा
दुश्मन
भी
ख़ानदानी
हो
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Akhtar Shumar
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तुझे
कौन
जानता
था
मेरी
दोस्ती
से
पहले
तेरा
हुस्न
कुछ
नहीं
था
मेरी
शा'इरी
से
पहले
Kaif Bhopali
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इस
से
पहले
कि
बे-वफ़ा
हो
जाएँ
क्यूँँ
न
ऐ
दोस्त
हम
जुदा
हो
जाएँ
Ahmad Faraz
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भले
ही
प्यार
हो
या
हिज्र
हो
या
फिर
सियासत
हो
कुछ
ऐसे
दोस्त
थे
हर
बात
पर
अश'आर
कहते
थे
Siddharth Saaz
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मुझ
सेे
पहले
कोई
रंग
लगाए
उनको
कैसे
सह
लें
यार
भला
ये
होली
में
हम
Priya Dixit
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एक
सीता
की
रिफ़ाक़त
है
तो
सब
कुछ
पास
है
ज़िंदगी
कहते
हैं
जिस
को
राम
का
बन-बास
है
Hafeez Banarasi
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फूल
हिस्से
के
मेरे
खिले
ही
नहीं
इसलिए
काँटो
से
अब
गिले
ही
नहीं
उसका
मिलने
को
इक
फ़ोन
आया
मुझे
उसके
पश्चात
हम
फिर
मिले
ही
नहीं
ज़िंदगी
ऐसे
इक
मोड़
पर
थी
खड़ी
आई
हिम्मत
मगर
हम
हिले
ही
नहीं
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Amit Kumar
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हार
जाते
हैं
जो
अपनी
ज़िन्दगी
में
होश
की
करते
हैं
बातें
मय-कशी
में
काम
करना
पड़ता
है
बीमारी
में
भी
ज़िन्दगी
लगती
है
सस्ती
मुफ़लिसी
में
कोई
ऐसा
कर
गया
कुछ
साथ
मेरे
घुल
के
आ
जाते
हैं
आँसू
अब
हँसी
में
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Amit Kumar
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एक
छह
साल
के
बच्चे
से
हँसना
सीखूँगा
मैं
अच्छे
से
ख़ुद
ही
रस्ते
पे
मैं
आ
गया
ज़िंदगी
तेरे
इक
धक्के
से
कोई
कानून
बनवाओ
अब
इश्क़
कम
है
नहीं
धंधे
से
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Amit Kumar
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क़ैद
लगती
है
ये
भी
जैसे
क़फ़स
में
चार
दिन
की
ज़िंदगी
ये
सौ
बरस
में
रूठ
कर
ऐसे
गया
मुझ
से
वो
इक
दिन
जैसे
तो
था
ही
नहीं
वो
दस्तरस
में
अब
नहीं
करता
कोई
ख़ातिर
किसी
के
है
कहाँ
अब
तो
किसी
के
कुछ
भी
बस
में
अब
जला
देगी
हवा
ये
ठंडी
मुझ
को
अच्छा
लगने
है
लगा
मुझको
उमस
में
सारी
दुनिया
ही
है
अब
इसके
तलब
में
कहते
हो
तुम
कुछ
नहीं
रक्खा
हवस
में
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Amit Kumar
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खटती
है
दिन
भर
एक
रोटी
के
लिए
माँ
और
क्या
ही
करती
बच्ची
के
लिए
आख़िर
में
हम
को
भी
बिछड़ना
ही
पड़ा
उन
थोड़े
से
लोगों
की
बस्ती
के
लिए
जब
देखा
मैंने
सूखते
पेड़ों
को
कुछ
उन
में
लगा
दी
आग
पानी
के
लिए
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Amit Kumar
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