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Amit Kumar
haar jaate hain jo apni zindagi men
haar jaate hain jo apni zindagi men | हार जाते हैं जो अपनी ज़िन्दगी में
- Amit Kumar
हार
जाते
हैं
जो
अपनी
ज़िन्दगी
में
होश
की
करते
हैं
बातें
मय-कशी
में
काम
करना
पड़ता
है
बीमारी
में
भी
ज़िन्दगी
लगती
है
सस्ती
मुफ़लिसी
में
कोई
ऐसा
कर
गया
कुछ
साथ
मेरे
घुल
के
आ
जाते
हैं
आँसू
अब
हँसी
में
- Amit Kumar
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इस
सोच
में
ही
मेरी
हर
रात
ढल
रही
है
बदले
हैं
लोग
या
फिर
दुनिया
बदल
रही
है
पानी
की
धार
पर
ये
मुझको
लगा
कि
जैसे
इक
सद
में
से
नदी
ये
बाहर
निकल
रही
है
मैं
कैसे
साथ
सबके
अपने
क़दम
मिलाऊँ
दुनिया
मिरी
समझ
से
कुछ
तेज़
चल
रही
है
वो
छाते
ही
अँधेरा
लगता
है
याद
आने
ये
देखो
शाम
भी
अब
जल्दी
से
ढल
रही
है
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Amit Kumar
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यही
तो
है
बस
कशमकश
ज़िन्दगी
की
कमी
पूरी
होती
नहीं
है
किसी
की
नज़र
आया
मरते
हुए
घर
का
चेहरा
अभी
है
बची
ज़िंदगी
ख़ुद-कुशी
की
अमीरों
के
घर
कोई
भूका
मरे
अब
है
लिखनी
कहानी
मुझे
मुफ़लिसी
की
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हम
नहीं
अब
तो
किसी
के
होने
वाले
जितना
भी
चाहे
ये
रो
लें
रोने
वाले
हम
थे
इक
मज़दूर
के
बेटे,
खिलौने
मिलते
भी
गर
थे
तो
पत्थर
ढोने
वाले
कैसे
ये
जानेंगे
साँसों
की
घुटन
को
लोग
ये
गमलों
में
पौधे
बोने
वाले
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Amit Kumar
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उसके
बेहद
मैं
नज़दीक
जा
कर
खो
दिया
इश्क़
मैंने
जता
कर
जाने
क्या
सूझी
आख़िर
में
उसको
बिछड़ा
मुझ
सेे
गले
भी
लगा
कर
सूखने
से
बचे
थे
जो
पौधे
ले
गई
उनको
बारिश
बहा
कर
इश्क़
का
खेल
सीधा
है
बिल्कुल
अब
न
मिलती
वफ़ा
है
वफ़ा
कर
दे
दी
उसको
घुटन
उम्र
भर
की
पेड़
गमले
में
हमने
लगा
कर
पानी
है
तुमको
अपनी
मोहब्बत
करना
फिर
जात
अपनी
बता
कर
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आती
है
मुझ
को
ख़ुद
पर
हँसी
ख़ुद
को
रोता
हुआ
सोच
कर
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