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Amit Kumar
is soch men hi mirii har raat dhal rahi hai
is soch men hi mirii har raat dhal rahi hai | इस सोच में ही मेरी हर रात ढल रही है
- Amit Kumar
इस
सोच
में
ही
मेरी
हर
रात
ढल
रही
है
बदले
हैं
लोग
या
फिर
दुनिया
बदल
रही
है
पानी
की
धार
पर
ये
मुझको
लगा
कि
जैसे
इक
सद
में
से
नदी
ये
बाहर
निकल
रही
है
मैं
कैसे
साथ
सबके
अपने
क़दम
मिलाऊँ
दुनिया
मिरी
समझ
से
कुछ
तेज़
चल
रही
है
वो
छाते
ही
अँधेरा
लगता
है
याद
आने
ये
देखो
शाम
भी
अब
जल्दी
से
ढल
रही
है
- Amit Kumar
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मेरे
अंदर
जब
तलक
ये
दिल
नहीं
था
भूलना
मेरे
लिए
मुुश्किल
नहीं
था
उसको
महबूबास
ज़्यादा
चाहा
मैंने
दोस्ती
भर
के
भी
जो
क़ाबिल
नहीं
था
उम्र
भर
आते
रहे
हैं
ख़्वाब
उसके
ज़िंदगी
में
जो
मुझे
हासिल
नहीं
था
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Amit Kumar
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वो
रूठ
कर
गया
मुझ
सेे
ऐसे
एक
दिन
की
जैसे
था
ही
नहीं
वो
तो
मेरे
दस्तरस
में
Amit Kumar
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ये
सुना
है
भली
मुहब्बत
है
फिर
गले
क्यूँ
पड़ी
मुहब्बत
है
होती
कब
की
अलग-थलग
दुनिया
है
ग़नीमत
अभी
मुहब्बत
है
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Amit Kumar
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यूँँ
तो
अच्छे
ही
चेहरे
सब
के
हैं
हम
को
पर
आप
अच्छे
लगते
हैं
तुम
से
ये
बाग़
बाग़
है
वर्ना
अब
कहाँ
फूल
भी
महकते
हैं
कोई
समझा
नहीं
हैं
इस
दिल
को
फिर
भी
क्यूँ
दिल
को
दिल
ही
कहते
हैं
ख़ूब-सूरत
तो
आप
भी
है
पर
बात
उसकी
ज़रा
सी
हट
के
है
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Amit Kumar
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अब
न
जाने
क्यूँँ
लगा
रहता
है
ये
डर
साथ
मेरे
सारा
अच्छा
हो
रहा
है
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