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Amit Kumar
kuchh isliye us men mira man lagta hai
kuchh isliye us men mira man lagta hai | कुछ इसलिए उस में मिरा मन लगता है
- Amit Kumar
कुछ
इसलिए
उस
में
मिरा
मन
लगता
है
वो
ऐसा
क़ातिल
है
जो
सज्जन
लगता
है
दीवारें
आ
जाती
हैं
भाई
भाई
में
अब
थोड़ी
घर
का
घर
से
आँगन
लगता
है
नाख़ून
इतने
प्यारे
हैं
उसके
कि
वो
जो
घाव
भी
कर
दे
तो
चंदन
लगता
है
जितना
जले
मज़बूत
उतना
होगा
ये
जीवन
किसी
मिट्टी
का
बर्तन
लगता
है
- Amit Kumar
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आधे
से
आधा
जब
घटा
होगा
वो
मुझे
छोड़
के
गया
होगा
मैं
तो
ये
सोच
होता
हूँ
पागल
क्या
ही
पागल
वो
सोचता
होगा
चैन
की
नींद
सोने
वाला
वो
सोचो
इक
दिन
बहुत
जगा
होगा
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Amit Kumar
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उसके
बेहद
मैं
नज़दीक
जा
कर
खो
दिया
इश्क़
मैंने
जता
कर
जाने
क्या
सूझी
आख़िर
में
उसको
बिछड़ा
मुझ
सेे
गले
भी
लगा
कर
सूखने
से
बचे
थे
जो
पौधे
ले
गई
उनको
बारिश
बहा
कर
इश्क़
का
खेल
सीधा
है
बिल्कुल
अब
न
मिलती
वफ़ा
है
वफ़ा
कर
दे
दी
उसको
घुटन
उम्र
भर
की
पेड़
गमले
में
हमने
लगा
कर
पानी
है
तुमको
अपनी
मोहब्बत
करना
फिर
जात
अपनी
बता
कर
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वो
रूठ
कर
गया
मुझ
सेे
ऐसे
एक
दिन
की
जैसे
था
ही
नहीं
वो
तो
मेरे
दस्तरस
में
Amit Kumar
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पहले
तो
ज़िंदगी
इक
हताशा
लगी
सोचा
समझा
तो
महँगी
असासा
लगी
तब
कहीं
लोगों
ने
जानवर
पाले
जब
उनको
इंसानियत
एक
झाँसा
लगी
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Amit Kumar
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कोई
बिछड़ा
नहीं
है
किसी
से
यहाँ
जिनको
जिनका
था
होना
वो
बस
हो
गए
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