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Amit Kumar
aadhe se aadha jab ghatta hogaa
aadhe se aadha jab ghatta hogaa | आधे से आधा जब घटा होगा
- Amit Kumar
आधे
से
आधा
जब
घटा
होगा
वो
मुझे
छोड़
के
गया
होगा
मैं
तो
ये
सोच
होता
हूँ
पागल
क्या
ही
पागल
वो
सोचता
होगा
चैन
की
नींद
सोने
वाला
वो
सोचो
इक
दिन
बहुत
जगा
होगा
- Amit Kumar
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आते
हैं
ग़ैब
से
ये
मज़ामीं
ख़याल
में
'ग़ालिब'
सरीर-ए-ख़ामा
नवा-ए-सरोश
है
Mirza Ghalib
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मैंने
मुद्दत
से
कोई
ख़्वाब
नहीं
देखा
है
हाथ
रख
दे
मेरी
आँखों
पे
कि
नींद
आ
जाए
Waseem Barelvi
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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पहले
ख़याल
रख
मिरा
मेहमान
कर
मुझे
फिर
अपनी
कोई
चाल
से
हैरान
कर
मुझे
हैं
कौन
आप,
याद
नहीं,कब
मिले
थे
हम
इतना
भी
ख़ुश
न
होइए
पहचान
कर
मुझे
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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बाग़बाँ
हम
तो
इस
ख़याल
के
हैं
देख
लो
फूल
फूल
तोड़ो
मत
Jaun Elia
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जलते
हैं
इक
चराग़
की
लौ
से
कई
चराग़
दुनिया
तिरे
ख़याल
से
रौशन
हुई
तो
है
Shahzad Ahmad
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तेरी
अंँगड़ाई
के
आलम
का
ख़याल
आया
जब
ज़ेहन-ए-वीरांँ
में
खनकने
लगे
कंगन
कितने
Shashank Shekhar Pathak
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हमको
हमारी
नींद
भी
वापस
नहीं
मिली
लोगों
को
उनके
ख़्वाब
जगा
कर
दिए
गए
Imran Aami
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पहले
तो
ज़िंदगी
इक
हताशा
लगी
सोचा
समझा
तो
महँगी
असासा
लगी
तब
कहीं
लोगों
ने
जानवर
पाले
जब
उनको
इंसानियत
एक
झाँसा
लगी
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Amit Kumar
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पाई
पाई
पैसा
अब
ख़ुद
का
बचाकर
आता
हिस्से
कुछ
नहीं
हिस्सा
बचाकर
मुफ़लिसों
ने
जीने
हैं
त्योहार
सारे
थोड़ा
थोड़ा
ख़र्चे
से
पैसा
बचाकर
ख़त्म
होती
ही
नहीं
ग़म
की
घड़ी
अब
क्या
मिलेगा
हम
को
इक
अर्सा
बचाकर
अब
बताने
वाला
भी
कोई
नहीं
है
और
चलना
है
ग़लत
रस्ता
बचाकर
ये
निशानी
रख
लो
अपनी
पास
अपने
क्या
करूँँगा
अब
मैं
इक
पुर्ज़ा
बचाकर
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Amit Kumar
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हार
जाते
हैं
जो
अपनी
ज़िन्दगी
में
होश
की
करते
हैं
बातें
मय-कशी
में
काम
करना
पड़ता
है
बीमारी
में
भी
ज़िन्दगी
लगती
है
सस्ती
मुफ़लिसी
में
कोई
ऐसा
कर
गया
कुछ
साथ
मेरे
घुल
के
आ
जाते
हैं
आँसू
अब
हँसी
में
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Amit Kumar
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कहानी
यार
बस
कुछ
शब्द
भर
की
थी
मगर
ये
बात
तो
सब
के
ही
घर
की
थी
मिटाना
चाहता
था
साथ
सब
के
मैं
वो
तन्हाई
जो
मुझको
उम्र
भर
की
थी
मैं
पहले
पेज
पर
ही
इन
के
अटका
हूँ
किताबें
जो
जो
भी
अच्छे
कवर
की
थी
ले
आया
साथ
वो
चीज़े
भी
घर
तक
वो
जो
मेरे
लिए
तो
बस
सफ़र
की
थी
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Amit Kumar
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इस
सोच
में
ही
मेरी
हर
रात
ढल
रही
है
बदले
हैं
लोग
या
फिर
दुनिया
बदल
रही
है
पानी
की
धार
पर
ये
मुझको
लगा
कि
जैसे
इक
सद
में
से
नदी
ये
बाहर
निकल
रही
है
मैं
कैसे
साथ
सबके
अपने
क़दम
मिलाऊँ
दुनिया
मिरी
समझ
से
कुछ
तेज़
चल
रही
है
वो
छाते
ही
अँधेरा
लगता
है
याद
आने
ये
देखो
शाम
भी
अब
जल्दी
से
ढल
रही
है
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Amit Kumar
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