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Dhiraj Singh 'Tahammul'
husn baksha jo KHuda ne aap bakhshen deed apni
husn baksha jo KHuda ne aap bakhshen deed apni | हुस्न बख़्शा जो ख़ुदा ने आप बख़्शें दीद अपनी
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
हुस्न
बख़्शा
जो
ख़ुदा
ने
आप
बख़्शें
दीद
अपनी
आरज़ू–ए–चश्म
पूरी
हो
मुकम्मल
ईद
अपनी
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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साक़ी
कुछ
आज
तुझ
को
ख़बर
है
बसंत
की
हर
सू
बहार
पेश-ए-नज़र
है
बसंत
की
Ufuq Lakhnavi
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मैं
खोया
खोया
सा
तेरी
छत
की
जानिब
देख
रहा
हूँ
गीले
कपड़े
सूख
रहे
हैं,
सूखी
आँखें
भीग
रही
हैं
Harman Dinesh
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सब
लोग
जिधर
वो
हैं
उधर
देख
रहे
हैं
हम
देखने
वालों
की
नज़र
देख
रहे
हैं
Dagh Dehlvi
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तुम
तो
सर्दी
की
हसीं
धूप
का
चेहरा
हो
जिसे
देखते
रहते
हैं
दीवार
से
जाते
हुए
हम
Nomaan Shauque
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तमाम
जिस्म
को
आँखें
बना
के
राह
तको
तमाम
खेल
मुहब्बत
में
इंतिज़ार
का
है
Munawwar Rana
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मुझे
आँखें
दिखाकर
बोलती
है
चुप
रहो
भैया
बहिन
छोटी
भले
हो
बात
वो
अम्मा
सी
करती
है
Divy Kamaldhwaj
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ज़ख़्म
लगे
हैं
कितने
दिल
पर
याद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
शाद
नहीं
हूँ
मैं
तुमको
नाशाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
उम्र
गए
पे
तेरी
सूरत
और
मिरी
आँखें
टकराईं
उम्र
गए
में
सोची
वो
फ़रियाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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हमारे
सीने
पे
उँगलियों
से
तुम
अपना
चेहरा
बना
रहे
थे
तुम्हें
कुछ
उस
की
ख़बर
नहीं
थी
हमारे
दिल
में
जो
चल
रहा
था
Nadim Nadeem
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इक
गुल
के
मुरझाने
पर
क्या
गुलशन
में
कोहराम
मचा
इक
चेहरा
कुम्हला
जाने
से
कितने
दिल
नाशाद
हुए
Faiz Ahmad Faiz
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उस
के
फ़रोग़-ए-हुस्न
से
झमके
है
सब
में
नूर
शम-ए-हरम
हो
या
हो
दिया
सोमनात
का
Meer Taqi Meer
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वस्ल
की
शब
इंतज़ारी
में
मरे
कोई
यहाँ
आरज़ू–ए–इश्क़
में
क्या–क्या
करे
कोई
यहाँ
बात
कोई
हो
लबों
पे
बात
उनकी
आ
गई
और
क्या
हो
आँख
को
ख़ूँ–ख़ूँ
भरे
कोई
यहाँ
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आपको
अकसर
खड़े
होकर
किनारे
देखते
हैं
डूबते
जाते
हैं
तिनकों
के
सहारे
देखते
हैं
देखते
हैं
देखने
वाले
न
जाने
आप
में
क्या
हम
हमारी
क़त्ल
के
मौज़ूँ
इशारे
देखते
हैं
हो
भला
गुस्ताख़
कैसे
अस्मत-ए-मरियम
में
कोई
चाँद
है
लुकता
हिजाबों
से
सितारे
देखते
हैं
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मयख़ाना
बनवाया
है
पे
रख
दी
है
तस्वीर
तुम्हारी
मय
की
पूछे
क्या
कोई
मदहोशी
है
तस्वीर
तुम्हारी
दहशत
में
रहता
है
दिल
ये
हर
पल
बस
अंजाम
से
अपने
क्या
होगा
जो
जाने
सब
याँ
रक्खी
है
तस्वीर
तुम्हारी
क्या
सूरत
हम
लिए
मुख़ातिब
होंगे
रोज़–ए–हश्र
ख़ुदास
सज्दे
में
होता
हूँ
जब
भी
दिखती
है
तस्वीर
तुम्हारी
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शाम
को
दीदार
अपना
आइने
में
हो
गया
फ़ाश
सब
किरदार
अपना
आइने
में
हो
गया
बरगुज़ीदा
एक
सूरत
क़ैद
आँखों
में
हुई
और
बस
घर-बार
अपना
आइने
में
हो
गया
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चराग़ाँ
ढूँढते
हैं
आतिश-ए-दिल
को
बुझाने
को
मुहब्बत
की
समझ
दे
कौन
इस
जाहिल
ज़माने
को
फ़रार-ए-क़ैद
लेकर
उड़
गया
ख़ुशियाँ
घराने
की
किया
था
क़ैद
इक
पंछी
कि
घर
का
दिल
लगाने
को
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