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Dhiraj Singh 'Tahammul'
shaam ko deedaar apna aaine men ho gaya
shaam ko deedaar apna aaine men ho gaya | शाम को दीदार अपना आइने में हो गया
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
शाम
को
दीदार
अपना
आइने
में
हो
गया
फ़ाश
सब
किरदार
अपना
आइने
में
हो
गया
बरगुज़ीदा
एक
सूरत
क़ैद
आँखों
में
हुई
और
बस
घर-बार
अपना
आइने
में
हो
गया
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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तुम
परिंदों
से
ज़ियादा
तो
नहीं
हो
आज़ाद
शाम
होने
को
है
अब
घर
की
तरफ़
लौट
चलो
Irfan Siddiqi
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कभी
सहर
तो
कभी
शाम
ले
गया
मुझ
से
तुम्हारा
दर्द
कई
काम
ले
गया
मुझ
से
Farhat Abbas Shah
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ख़ुश
रहते
हैं
हँस
सकते
हैं
भोले
भाले
होते
हैं
वो
जो
शे'र
नहीं
कहते
हैं
क़िस्मत
वाले
होते
हैं
पीना
अच्छी
बात
नहीं
है
आते
हैं
समझाने
दोस्त
और
ढलते
ही
शाम
उन्हें
फिर
हमीं
सँभाले
होते
हैं
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Vineet Aashna
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परिन्दे
होते
तो
डाली
पर
लौट
भी
जाते
हमें
न
याद
दिलाओ
कि
शाम
हो
गई
है
Rajesh Reddy
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शाम
थी
हिज्र
की
हाल
मत
पूछना
आँख
थकने
लगे
तो
जिगर
रो
पड़े
Piyush Mishra 'Aab'
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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आख़िरी
बार
मैं
कब
उस
से
मिला
याद
नहीं
बस
यही
याद
है
इक
शाम
बहुत
भारी
थी
Hammad Niyazi
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देख
कर
इंसान
की
बेचारगी
शाम
से
पहले
परिंदे
सो
गए
Iffat Zarrin
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शाम-ए-ग़म
करवट
बदलता
ही
नहीं
वक़्त
भी
ख़ुद्दार
है
तेरे
बग़ैर
Shakeel Badayuni
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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घूमता
है
दिल
में
मेरे
एक
नम
ख़याल
किस
तरह
से
खोजते
हैं
लोग
हम
ख़याल
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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तुझे
देखे
हुआ
अर्सा
किए
कोई
बहाना
आ
हुई
सब
ख़त्म
अफ़वाहें
नया
लिखने
फ़साना
आ
चला
आ
आदत-ए-आलम
नहीं
बदली
न
बदलेगी
बदल
दे
आदत-ए-फ़िर
औनियत
चल
हो
रवाना
आ
न
बेनूरी
पे
अपनी
बाद
में
रोना
कहीं
नरगिस
चमन
में
आज
दीदावर
हुआ
ऐ
आज़राना
आ
तिरी
तरकश
के
तरसे
तीर
से
क़ुर्बत
का
मौक़ा
दे
तरसते
हैं
तहम्मुल
भी
बने
बैठे
निशाना
आ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ज़िंदगी
की
शमा
जब
जलाई
गई
दर्द
की
संग
में
रौशनाई
गई
अश्क
आँखें
मुसलसल
बहाती
रहीं
पे
मुसलसल
ही
ग़ज़लें
सुनाई
गई
याद
तेरी
रही
साथ
मेरे
मगर
याद
भी
साथ
क्या
वो
भी
आई
गई
ज़ेहन
को
थी
ख़बर
वो
नहीं
है
यहाँ
और
दिल
को
तसल्ली
दिलाई
गई
ले
के
तेरा
गिला
दोस्तों
से
मिला
हस्ब-ए-दस्तूर
मय
भी
पिलाई
गई
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जिस
तरफ़
भी
हाथ
डाला
ग़म
निकल
आए
हो
रफ़ू
कैसे
बदन
की
दम
निकल
आए
खा
रहा
था
अक्स
तेरा
जो
रहा
मुझ
में
थे
नहीं
महफूज़
ख़ुद
में
हम
निकल
आए
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मयख़ाना
बनवाया
है
पे
रख
दी
है
तस्वीर
तुम्हारी
मय
की
पूछे
क्या
कोई
मदहोशी
है
तस्वीर
तुम्हारी
दहशत
में
रहता
है
दिल
ये
हर
पल
बस
अंजाम
से
अपने
क्या
होगा
जो
जाने
सब
याँ
रक्खी
है
तस्वीर
तुम्हारी
क्या
सूरत
हम
लिए
मुख़ातिब
होंगे
रोज़–ए–हश्र
ख़ुदास
सज्दे
में
होता
हूँ
जब
भी
दिखती
है
तस्वीर
तुम्हारी
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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