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Dhiraj Singh 'Tahammul'
tujhe dekhe hua arsa ki.e koi bahaana aa
tujhe dekhe hua arsa ki.e koi bahaana aa | तुझे देखे हुआ अर्सा किए कोई बहाना आ
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
तुझे
देखे
हुआ
अर्सा
किए
कोई
बहाना
आ
हुई
सब
ख़त्म
अफ़वाहें
नया
लिखने
फ़साना
आ
चला
आ
आदत-ए-आलम
नहीं
बदली
न
बदलेगी
बदल
दे
आदत-ए-फ़िर
औनियत
चल
हो
रवाना
आ
न
बेनूरी
पे
अपनी
बाद
में
रोना
कहीं
नरगिस
चमन
में
आज
दीदावर
हुआ
ऐ
आज़राना
आ
तिरी
तरकश
के
तरसे
तीर
से
क़ुर्बत
का
मौक़ा
दे
तरसते
हैं
तहम्मुल
भी
बने
बैठे
निशाना
आ
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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जिस
की
हर
शाख़
पे
राधाएँ
मचलती
होंगी
देखना
कृष्ण
उसी
पेड़
के
नीचे
होंगे
Bekal Utsahi
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समुंदर
में
भी
सहरा
देखना
है
मुझे
महफ़िल
में
तन्हा
देख
लेना
Aqib khan
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उसी
के
चेहरे
पे
आँखें
हमारी
रह
जाएँ
किसी
को
इतना
भी
क्या
देखना
ज़रूरी
है
Jyoti Azad Khatri
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इक
शख़्स
मेरे
घर
पे
नमाज़ों
में
है
लगा
जो
चाहता
है
देखना
अच्छाइयों
के
दिन
Aqib khan
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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बातें
दवा
का
काम
कर
सकतीं
हैं
यार
बीमार
से
तुम
बात
करके
देखना
Shubhangi kalii
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तड़पना
हिज्र
तक
सीमित
नहीं
है
उसे
दुल्हन
भी
बनते
देखना
है
Anand Verma
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तुम
कली
पर
निखार
आने
दो
देखना
डाल
ख़ुद
झटक
देगी
Vishal Bagh
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मिरे
ही
वास्ते
लाया
है
दोनो
फूल
और
ख़ंजर
मुझे
ये
देखना
है
बस
वो
पहले
क्या
उठाता
है
Parul Singh "Noor"
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बग़ैर
चश्में
के
जो
देख
भी
न
पाता
है
वो
बेवक़ूफ़
मुझे
देखना
सिखाता
है
अगर
ये
वक़्त
डुबोएगा
मेरी
नाव
को
तो
इस
सेे
कह
दो
मुझे
तैरना
भी
आता
है
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Vikram Gaur Vairagi
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अभी
हमको
मुनासिब
आप
होते
से
नहीं
लगते
ब–चश्म–ए–तर
मुख़ातिब
हैं
प
रोते
से
नहीं
लगते
वही
दर्या
बहुत
गहरा
वही
तैराक
हम
अच्छे
हुआ
है
दफ़्न
मोती
अब
कि
गोते
से
नहीं
लगते
ये
आई
रात
आँखों
को
चलो
खूँ–खूँ
किया
जाए
बदन
ये
सो
भी
जाए
आँख
सोते
से
नहीं
लगते
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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आह
से
कराह
की
है
चाह
पर
हूँ
चुप
अब
फ़क़त
है
दर्द
से
निबाह
पर
हूँ
चुप
कर
दिया
है
क़त्ल
मैंने
आप
को
कहीं
और
हूँ
मैं
आप
ही
गवाह
पर
हूँ
चुप
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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आपको
अकसर
खड़े
होकर
किनारे
देखते
हैं
डूबते
जाते
हैं
तिनकों
के
सहारे
देखते
हैं
देखते
हैं
देखने
वाले
न
जाने
आप
में
क्या
हम
हमारी
क़त्ल
के
मौज़ूँ
इशारे
देखते
हैं
हो
भला
गुस्ताख़
कैसे
अस्मत-ए-मरियम
में
कोई
चाँद
है
लुकता
हिजाबों
से
सितारे
देखते
हैं
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ख़ुदाया
ज़िंदगी
में
काश
ये
वक़्फ़ा
नहीं
होता
यहाँ
पेशानियों
का
बोझ
तक
हल्का
नहीं
होता
गुज़र
जाते
ये
दिन
हैं
वाक़िआत-ए-रोज़-मर्रा
में
मगर
ये
रात
का
साया
कभी
धुँदला
नहीं
होता
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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