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Dhiraj Singh 'Tahammul'
vasl ki shab intazaari men mare koi yahaañ
vasl ki shab intazaari men mare koi yahaañ | वस्ल की शब इंतज़ारी में मरे कोई यहाँ
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
वस्ल
की
शब
इंतज़ारी
में
मरे
कोई
यहाँ
आरज़ू–ए–इश्क़
में
क्या–क्या
करे
कोई
यहाँ
बात
कोई
हो
लबों
पे
बात
उनकी
आ
गई
और
क्या
हो
आँख
को
ख़ूँ–ख़ूँ
भरे
कोई
यहाँ
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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आप
तो
मुँह
फेर
कर
कहते
हैं
आने
के
लिए
वस्ल
का
वा'दा
ज़रा
आँखें
मिला
कर
कीजिए
Lala Madhav Ram Jauhar
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तेरा
मिलना
ख़ुशी
की
बात
सही
तुझ
से
मिल
कर
उदास
रहता
हूँ
Sahir Ludhianvi
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ज़िंदगी
दूर
ही
हमें
कर
दे
मौत
के
बाद
वस्ल
मुमकिन
है
Akash Panwar
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मिलना
तो
ख़ैर
उसको
नसीबों
की
बात
है
देखे
हुए
भी
उस
को
ज़माना
गुज़र
गया
Adeem Hashmi
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ये
भी
मुमकिन
है
मियाँ
आँख
भिगोने
लग
जाऊँ
वो
कहे
कैसे
हो
तुम
और
मैं
रोने
लग
जाऊँ
ऐ
मेरी
आँख
में
ठहराए
हुए
वस्ल
के
ख़्वाब
मैं
तवातुर
से
तेरे
साथ
न
सोने
लग
जाऊँ
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Ejaz Tawakkal Khan
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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मैं
इसलिए
भी
तिरे
वस्ल
से
झिझकता
हूँ
कहीं
फिर
इश्क़
मेरा
रायगाँ
न
हो
जाए
Wajid Husain Sahil
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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तू
दिल
पे
बोझ
ले
के
मुलाक़ात
को
न
आ
मिलना
है
इस
तरह
तो
बिछड़ना
क़ुबूल
है
Unknown
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सुख़न
अब
तक
तिरी
ज़ुल्फ़ों
के
पेचओख़म
में
उलझा
है
हमें
जब
इश्क़
होगा
तो
बयाँ
अश'आर
कर
देंगे
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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वक़्त
का
था
तक़ाज़ा
बदलता
रहा
कोई
बाहों
में
आ
के
फिसलता
रहा
सोचते
थे
परिंदा
वो
महफ़ूज़
है
क़ैद
खाती
रही
वो
मचलता
रहा
एक
पल
में
छुड़ा
हाथ
रुख़्सत
हुआ
मैं
खड़ा
देर
तक
हाथ
मलता
रहा
यूँँ
नहीं
आ
गया
नूर
ये
शाम
का
डूबता
था
कि
सूरज
वो
जलता
रहा
कौन
थे
लोग
जिनको
मिली
मंज़िलें
उम्र
भर
ही
तहम्मुल
टहलता
रहा
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ज़ख़्म
लगे
हैं
कितने
दिल
पर
याद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
शाद
नहीं
हूँ
मैं
तुमको
नाशाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
उम्र
गए
पे
तेरी
सूरत
और
मिरी
आँखें
टकराईं
उम्र
गए
में
सोची
वो
फ़रियाद
करूँँ
या
तुमको
देखूँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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तुझे
देखे
हुआ
अर्सा
किए
कोई
बहाना
आ
हुई
सब
ख़त्म
अफ़वाहें
नया
लिखने
फ़साना
आ
चला
आ
आदत-ए-आलम
नहीं
बदली
न
बदलेगी
बदल
दे
आदत-ए-फ़िर
औनियत
चल
हो
रवाना
आ
न
बेनूरी
पे
अपनी
बाद
में
रोना
कहीं
नरगिस
चमन
में
आज
दीदावर
हुआ
ऐ
आज़राना
आ
तिरी
तरकश
के
तरसे
तीर
से
क़ुर्बत
का
मौक़ा
दे
तरसते
हैं
तहम्मुल
भी
बने
बैठे
निशाना
आ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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घूमता
है
दिल
में
मेरे
एक
नम
ख़याल
किस
तरह
से
खोजते
हैं
लोग
हम
ख़याल
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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