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Sandeep Thakur
zindagi ik film hai milnaa bichadna seen hain
zindagi ik film hai milnaa bichadna seen hain | ज़िंदगी इक फ़िल्म है मिलना बिछड़ना सीन हैं
- Sandeep Thakur
ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
- Sandeep Thakur
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तंग
आ
चुके
हैं
कशमकश-ए-ज़िंदगी
से
हम
ठुकरा
न
दें
जहाँ
को
कहीं
बे-दिली
से
हम
Sahir Ludhianvi
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ज़िंदगी
मेरी
मुझे
क़ैद
किए
देती
है
इस
को
डर
है
मैं
किसी
और
का
हो
सकता
हूँ
Azm Shakri
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ज़िंदगी
यूँँही
बहुत
कम
है
मोहब्बत
के
लिए
रूठ
कर
वक़्त
गँवाने
की
ज़रूरत
क्या
है
Unknown
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जान
भी
अब
दिल
पे
वारी
जाएगी
ये
बला
सर
से
उतारी
जाएगी
एक
पल
तुझ
बिन
गुज़रना
है
कठिन
ज़िन्दगी
कैसे
गुज़ारी
जाएगी
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Anjum Rehbar
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आधी
आधी
रात
तक
सड़कों
के
चक्कर
काटिए
शा'इरी
भी
इक
सज़ा
है
ज़िंदगी
भर
काटिए
कोई
तो
हो
जिस
से
उस
ज़ालिम
की
बातें
कीजिए
चौदहवीं
का
चाँद
हो
तो
रात
छत
पर
काटिए
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Nisar Nasik
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ज़िंदगी
यूँँ
हुई
बसर
तन्हा
क़ाफ़िला
साथ
और
सफ़र
तन्हा
Gulzar
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तल्ख़ियाँ
इस
में
बहुत
कुछ
हैं
मज़ा
कुछ
भी
नहीं
ज़िंदगी
दर्द-ए-मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
भी
नहीं
Kaleem Aajiz
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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शोर
की
इस
भीड़
में
ख़ामोश
तन्हाई
सी
तुम
ज़िन्दगी
है
धूप
तो
मद-मस्त
पुर्वाई
सी
तुम
चाहे
महफ़िल
में
रहूँ
चाहे
अकेले
में
रहूँ
गूँजती
रहती
हो
मुझ
में
शोख़
शहनाई
सी
तुम
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Kunwar Bechain
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हर
शे'र
हर
ग़ज़ल
पे
है
ऐसी
छाप
तेरी
तस्वीर
बन
रही
है
इक
अपने
आप
तेरी
तेरे
लिए
किसी
को
इतना
दीवाना
देखा
लगने
लगी
है
मुझ
को
चाहत
भी
पाप
तेरी
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Sandeep Thakur
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मुझ
से
दो
दिन
अलग
रही
है
तू
देख
तो
कैसी
लग
रही
है
तू
हो
गया
राख
जल
के
मैं
लेकिन
धीरे-धीरे
सुलग
रही
है
तू
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Sandeep Thakur
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रिश्ते
से
बाहर
निकले
हैं
सद
में
से
बाहर
निकले
हैं
बरसों
अंदर
अंदर
घुट
कर
झटके
से
बाहर
निकले
हैं
आज
उदासी
तन्हाई
के
क़ब्ज़े
से
बाहर
निकले
हैं
नींद
हमारी
टूट
गई
है
सपने
से
बाहर
निकले
हैं
हर
चादर
से
पैर
हमारे
थोड़े
से
बाहर
निकले
हैं
दिल
में
पिंजरा
लेकर
पंछी
पिंजरे
से
बाहर
निकले
हैं
लोग
घुसे
थे
एक
महल
में
मलबे
से
बाहर
निकले
हैं
इस
मंज़िल
के
सारे
रस्ते
नक़्शे
से
बाहर
निकले
हैं
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Sandeep Thakur
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जाम
सिगरेट
कश
और
बस
कुछ
धुआँ
आख़िरश
और
बस
मौत
तक
ज़िंदगी
का
सफ़र
रात-दिन
कश्मकश
और
बस
पी
गया
पेड़
आँधी
मगर
गिर
पड़ा
खा
के
ग़श
और
बस
ज़िंदगी
जलती
सिगरेट
है
सिर्फ़
दो-चार
कश
और
बस
सूखते
पेड़
की
लकड़ियाँ
आख़िरी
पेशकश
और
बस
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Sandeep Thakur
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अनोखा
शख़्स
था
उस
से
मिलाया
हाथ
जब
मैंने
लगा
जैसे
कि
उस
की
उँगलियों
में
दिल
धड़कता
था
Sandeep Thakur
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