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Dhiraj Singh 'Tahammul'
vaqt ka tha taqaza badalta raha
vaqt ka tha taqaza badalta raha | वक़्त का था तक़ाज़ा बदलता रहा
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
वक़्त
का
था
तक़ाज़ा
बदलता
रहा
कोई
बाहों
में
आ
के
फिसलता
रहा
सोचते
थे
परिंदा
वो
महफ़ूज़
है
क़ैद
खाती
रही
वो
मचलता
रहा
एक
पल
में
छुड़ा
हाथ
रुख़्सत
हुआ
मैं
खड़ा
देर
तक
हाथ
मलता
रहा
यूँँ
नहीं
आ
गया
नूर
ये
शाम
का
डूबता
था
कि
सूरज
वो
जलता
रहा
कौन
थे
लोग
जिनको
मिली
मंज़िलें
उम्र
भर
ही
तहम्मुल
टहलता
रहा
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ग़ुबार-ए-वक़्त
में
अब
किस
को
खो
रही
हूँ
मैं
ये
बारिशों
का
है
मौसम
कि
रो
रही
हूँ
मैं
Shahnaz Parveen Sahar
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ज़हीफ़ी
इस
लिए
मुझको
सुहानी
लग
रही
है
इसे
कमाने
में
पूरी
जवानी
लग
रही
है
नतीजा
ये
है
कि
बरसों
तलाश-ए-ज़ात
के
बाद
वहाँ
खड़ा
हूँ
जहाँ
रेत
पानी
लग
रही
है
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Khalid Sajjad
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तन्हा
ही
सही
लड़
तो
रही
है
वो
अकेली
बस
थक
के
गिरी
है
अभी
हारी
तो
नहीं
है
Ali Zaryoun
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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अभी
से
पाँव
के
छाले
न
देखो
अभी
यारो
सफ़र
की
इब्तिदा
है
Ejaz Rahmani
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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बहुत
क़रीब
रही
है
ये
ज़िन्दगी
हम
से
बहुत
अज़ीज़
सही
ए'तिबार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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वो
राही
हूँ
पलभर
के
लिए,
जो
ज़ुल्फ़
के
साए
में
ठहरा,
अब
ले
के
चल
दूर
कहीं,
ऐ
इश्क़
मेरे
बेदाग
मुझे
।
Raja Mehdi Ali Khan
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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वस्ल
की
शब
इंतज़ारी
में
मरे
कोई
यहाँ
आरज़ू–ए–इश्क़
में
क्या–क्या
करे
कोई
यहाँ
बात
कोई
हो
लबों
पे
बात
उनकी
आ
गई
और
क्या
हो
आँख
को
ख़ूँ–ख़ूँ
भरे
कोई
यहाँ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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अभी
हमको
मुनासिब
आप
होते
से
नहीं
लगते
ब–चश्म–ए–तर
मुख़ातिब
हैं
प
रोते
से
नहीं
लगते
वही
दर्या
बहुत
गहरा
वही
तैराक
हम
अच्छे
हुआ
है
दफ़्न
मोती
अब
कि
गोते
से
नहीं
लगते
ये
आई
रात
आँखों
को
चलो
खूँ–खूँ
किया
जाए
बदन
ये
सो
भी
जाए
आँख
सोते
से
नहीं
लगते
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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इश्क़
के
हमको
न
पेच–ओ–ख़म
चाहिए
हैं
सुख़न-वर
हम
हमें
तो
ग़म
चाहिए
है
सदाक़त
बात
में
कैसे
हो
यक़ी
सच
में
सच
है
आँख
तब
तो
नम
चाहिए
ना–ख़ुदा
का
कौन
था
काइल
या–ख़ुदा
कौन
है
महफ़िल
में
जिसको
हम
चाहिए
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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साथ
दिया
है
किसने
किसका
किसकी
सोहबत
कौन
चलेगा
मेरी
ज़िल्लत
मेरी
ख़िफ़्फ़त
लेकर
तोहमत
कौन
चलेगा
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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ख़ून
से
जोड़ा
हुआ
हर
ईंट
ढेला
हो
गया
दो
तरफ़
चूल्हे
जले
औ'
घर
अकेला
हो
गया
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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