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Dhiraj Singh 'Tahammul'
ishq ke hamko na pech-o-kham chahiye
ishq ke hamko na pech-o-kham chahiye | इश्क़ के हमको न पेच–ओ–ख़म चाहिए
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
इश्क़
के
हमको
न
पेच–ओ–ख़म
चाहिए
हैं
सुख़न-वर
हम
हमें
तो
ग़म
चाहिए
है
सदाक़त
बात
में
कैसे
हो
यक़ी
सच
में
सच
है
आँख
तब
तो
नम
चाहिए
ना–ख़ुदा
का
कौन
था
काइल
या–ख़ुदा
कौन
है
महफ़िल
में
जिसको
हम
चाहिए
- Dhiraj Singh 'Tahammul'
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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तकल्लुफ़
छोड़कर
आओ
उसे
फिर
से
जिया
जाए
हमारा
बचपना
जो
एल्बमों
में
क़ैद
रहता
है
Shiva awasthi
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पहले
पानी
को
और
हवा
को
बचाओ
ये
बचा
लो
तो
फिर
ख़ुदा
को
बचाओ
Swapnil Tiwari
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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ज़िक्र
तुम्हारा
बहुत
ज़रूरी
इन
ग़ज़लों
में
जानेमन
चाय
बिना
अदरक
को
डाले
अच्छी
थोड़ी
बनती
है
Tanoj Dadhich
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कई
शे'र
पढ़
कर
है
ये
बात
जानी
कोई
शे'र
उसके
मुक़ाबिल
नहीं
है
Alankrat Srivastava
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किसी
से
छोटी
सी
एक
उम्मीद
बाँध
लीजिए
मोहब्बतों
का
अगर
जनाज़ा
निकालना
है
Shakeel Jamali
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तुझे
छूकर
अभी
तक
होश
में
हूँ
कमी
कोई
कहीं
तो
रह
गई
है
Abhay Mishra
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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इक
रोज़
इक
नदी
के
किनारे
मिलेंगे
हम
इक
दूसरे
से
अपना
पता
पूछते
हुए
Shahbaz Rizvi
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तुझे
देखे
हुआ
अर्सा
किए
कोई
बहाना
आ
हुई
सब
ख़त्म
अफ़वाहें
नया
लिखने
फ़साना
आ
चला
आ
आदत-ए-आलम
नहीं
बदली
न
बदलेगी
बदल
दे
आदत-ए-फ़िर
औनियत
चल
हो
रवाना
आ
न
बेनूरी
पे
अपनी
बाद
में
रोना
कहीं
नरगिस
चमन
में
आज
दीदावर
हुआ
ऐ
आज़राना
आ
तिरी
तरकश
के
तरसे
तीर
से
क़ुर्बत
का
मौक़ा
दे
तरसते
हैं
तहम्मुल
भी
बने
बैठे
निशाना
आ
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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इश्क़
के
बीमार
का
वाजिब
मुक़द्दर
मय-कदा
राह
मुश्किल
है
न
हो
हर
मील
पर
गर
मय-कदा
आदमी
होते
‘तहम्मुल’
रोज़
जाते
काम
पर
गर
गली
ये
छोड़
देते
है
जहाँ
पर
मय-कदा
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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जिस
तरफ़
भी
हाथ
डाला
ग़म
निकल
आए
हो
रफ़ू
कैसे
बदन
की
दम
निकल
आए
खा
रहा
था
अक्स
तेरा
जो
रहा
मुझ
में
थे
नहीं
महफूज़
ख़ुद
में
हम
निकल
आए
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Dhiraj Singh 'Tahammul'
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फ़क़त
हम
ही
नहीं
रुसवा
हुए
हैं
जान
दिल्ली
में
कई
शाहों
के
टूटे
हैं
यहाँ
अरमान
दिल्ली
में
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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हुस्न
बख़्शा
जो
ख़ुदा
ने
आप
बख़्शें
दीद
अपनी
आरज़ू–ए–चश्म
पूरी
हो
मुकम्मल
ईद
अपनी
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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