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Shubham Rai 'shubh'
kahaanii apni jo ik maskhara sunaane laga
kahaanii apni jo ik maskhara sunaane laga | कहानी अपनी जो इक मसख़रा सुनाने लगा
- Shubham Rai 'shubh'
कहानी
अपनी
जो
इक
मसख़रा
सुनाने
लगा
कि
बैठे
लोगों
के
आँखों
में
आँसू
आने
लगा
- Shubham Rai 'shubh'
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अब
उदास
फिरते
हो
सर्दियों
की
शामों
में
इस
तरह
तो
होता
है
इस
तरह
के
कामों
में
Shoaib Bin Aziz
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मुझ
ऐसा
शख़्स
अगर
क़हक़हों
से
भर
जाए
ये
साँस
लेती
उदासी
तो
घुट
के
मर
जाए
वो
मेरे
बाद
तरस
जाएगा
मोहब्बत
को
उसे
ये
कहना
अगर
हो
सके
तो
मर
जाए
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Rakib Mukhtar
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गर
कोई
मुझ
सेे
आकर
कहता,
यार
उदासी
है
मैं
उसको
गले
लगाकर
कहता,
यार
उदासी
है
होता
दरवेश
अगर
मैं
तो
फिर
सारी
दो-पहरी
गलियों
में
सदा
लगाकर
कहता,
यार
उदासी
है
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Siddharth Saaz
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दुख
की
दीमक
अगर
नहीं
लगती
ज़िन्दगी
किस
क़द्र
हसीं
लगती
वस्ल
को
लॉटरी
समझता
हूँ
लॉटरी
रोज़
तो
नहीं
लगती
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Azbar Safeer
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लाज़िम
है
अब
कि
आप
ज़ियादा
उदास
हों
इस
शहर
में
बचे
हैं
बहुत
कम
उदास
लोग
Bhaskar Shukla
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कुछ
ख़ुशियाँ
कुछ
आँसू
दे
कर
टाल
गया
जीवन
का
इक
और
सुनहरा
साल
गया
Unknown
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हम
तो
बचपन
में
भी
अकेले
थे
सिर्फ़
दिल
की
गली
में
खेले
थे
Javed Akhtar
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ज़िंदगी
इक
फ़िल्म
है
मिलना
बिछड़ना
सीन
हैं
आँख
के
आँसू
तिरे
किरदार
की
तौहीन
हैं
Sandeep Thakur
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एक
दुख
ये
के
तू
मिलने
नहीं
आया
मुझ
सेे
एक
दुख
ये
के
उस
दिन
मेरा
घर
ख़ाली
था
Tehzeeb Hafi
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जो
सावन
होते
सूखा,
उस
फूल
पे
लानत
हो
मुझ
पे
लानत,
तेरे
होते,
यार
उदासी
है
Siddharth Saaz
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क़बीले
के
अपने
वफ़ादार
तुम
हो
हो
जनता
की
हामी
या
इनकार
तुम
हो
हक़ीक़त
क़लम
से
निकलती
नहीं
है
ख़रीदा
हुआ
जैसे
अख़बार
तुम
हो
दिखाओगे
तुम
तो
धमक
रंगदारी
है
नेता
सभी
गुंडे
सरकार
तुम
हो
दिखाकर
के
सपने
जो
काटी
हैं
ज़ेबें
गरीबों
के
कैसे
मददगार
तुम
हो
ग़नीमत
है
हम
बोल
देते
हैं
वर्ना
भगत
सब
तुम्हारे
निराकार
तुम
हो
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Shubham Rai 'shubh'
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निगह
में
मुझे
जिसके
आना
नहीं
था
जहाँ
आना
था
ये
ज़माना
नहीं
था
बिताता
रहा
ज़िंदगी
जिस
तरह
से
मुझे
इस
तरह
से
बिताना
नहीं
था
सता
जो
रही
है
मोहब्बत
मुझे
अब
कि
कल
कह
रही
दिल
लगाना
नहीं
था
ख़ता
इतनी
बस
कर
गया
दिल-लगी
में
तुम्हीं
दिल-नशीं
हो
जताना
नहीं
था
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Shubham Rai 'shubh'
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उसके
हाथों
की
हिना
भी
पूछती
होगी
है
कहाँ
जिस
सेे
मोहब्बत
थी
कभी
तुमको
Shubham Rai 'shubh'
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बख़्त
अच्छा
हुआ
सो
मिलने
आए
हैं
वर्ना
तो
लोग
काफ़ी
व्यस्त
रहते
हैं
Shubham Rai 'shubh'
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प्रेम
होता
बुरा
तो
जताते
नहीं
पास
चलकर
के
तुम
भी
तो
आते
नहीं
राम
को
जानकी
प्रिय
न
होती
अगर
सिंधु
के
बीच
पुल
फिर
बनाते
नहीं
भाव
ही
देखते
है
सभी
का
प्रभु
वर्ना
शबरी
के
झूठन
वो
खाते
नहीं
चाहते
वो
कि
माया
में
उलझे
रहो
पाठ
गीता
का
फिर
वो
सुनाते
नहीं
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