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Shubham Rai 'shubh'
qabeele ke apne wafadar tum ho
qabeele ke apne wafadar tum ho | क़बीले के अपने वफ़ादार तुम हो
- Shubham Rai 'shubh'
क़बीले
के
अपने
वफ़ादार
तुम
हो
हो
जनता
की
हामी
या
इनकार
तुम
हो
हक़ीक़त
क़लम
से
निकलती
नहीं
है
ख़रीदा
हुआ
जैसे
अख़बार
तुम
हो
दिखाओगे
तुम
तो
धमक
रंगदारी
है
नेता
सभी
गुंडे
सरकार
तुम
हो
दिखाकर
के
सपने
जो
काटी
हैं
ज़ेबें
गरीबों
के
कैसे
मददगार
तुम
हो
ग़नीमत
है
हम
बोल
देते
हैं
वर्ना
भगत
सब
तुम्हारे
निराकार
तुम
हो
- Shubham Rai 'shubh'
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निगह
में
मुझे
जिसके
आना
नहीं
था
जहाँ
आना
था
ये
ज़माना
नहीं
था
बिताता
रहा
ज़िंदगी
जिस
तरह
से
मुझे
इस
तरह
से
बिताना
नहीं
था
सता
जो
रही
है
मोहब्बत
मुझे
अब
कि
कल
कह
रही
दिल
लगाना
नहीं
था
ख़ता
इतनी
बस
कर
गया
दिल-लगी
में
तुम्हीं
दिल-नशीं
हो
जताना
नहीं
था
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ज़िंदगी
गुज़र
रही
है
धीरे
धीरे
एक
वक़्त
है
हमारा
जो
ठहरा
है
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उस
झरोखे
से
मुझको
इशारा
हुआ
करता
था
जब
मैं
लड़का
बहुत
सीधा-सादा
हुआ
करता
था
एक
लड़की
थी
जो
मुस्कुराते
हुए
दिखती
थी
जब
भी
कक्षा
में
चर्चा
हमारा
हुआ
करता
था
दोस्तों
में
बहुत
मिलता
था
मान
सम्मान
पर
टीचरों
की
नज़र
में
नकारा
हुआ
करता
था
अच्छे
अच्छे
उतर
आए
हैं
अपनी
औक़ात
पर
जिनसे
अपना
कभी
भाई
चारा
हुआ
करता
था
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जो
लगेगा
मौक़ा
तो
पूछेंगे
हम
इश्क़
ये
मरहम
है
तो
किसके
लिए
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ऐसे
कुछ
मस्ताने
निकले
फ़िक्री
को
झुठलाने
निकले
मन-मौजी
हो
भौंरे
देखो
फूलों
को
बहलाने
निकले
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